बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

बदलाव के नायक

बदलाव के नायक

राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है ‘बदलाव’ | राजनीति में जाति विशेष की बहुलता के साथ ही समय समय पर नायक भी बदले जाते हैं | भारत की वर्तमान राजनीति में दलित वर्ग को सभी पार्टियाँ बहुत ही प्यार भरी नज़र से देख रहीं हैं और अपने अपने तरीके से डॉ भीमराव आंबेडकर को अपना नायक बताने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं | आज अम्बेडकर सभी राजनितिक दलों की जरुरत बन गए हैं | ऐसा लगता है की सत्ता की चाबी हैं, अम्बेडकर | खैर , उच्च वर्ग से धीरे धीरे निम्न वर्ग की तरफ झुकती हुई पार्टियाँ यह एहसास तो दिला रही है की दलित मजबूत हुआ है और हो रहा है तथा यह इस बात का द्योतक है की समाज अपने बेहतर अवस्था में आने के लिए अंगड़ाई ले रहा है |
पर एक प्रश्न हमेशा ज़ेहन में रहता है की क्या यह राजनितिक पार्टियाँ बस चुनावी लाभ के लिए ही दलित प्रेम दिखाती है या वास्तव में इनके दिल में वह प्यार है ?
हालाँकि सीधा सीधा तो बस यही लगता है की यह बस एक दिखावा ही है | वोट मिल जाये और फिर काम निकल जाये | पार्टियों का मुख्य उद्देश्य तो यही रहता है की दलित वर्ग या पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को पार्टी में लायें और उस समाज का वोट उस आधार पर पाएं | क्योंकी यह जो समाज के आधुनिक उद्धारक हैं वह सिर्फ अपना फायदा देखते हैं इनको खुद के ही समाज से ज्यादा सारोकार नहीं होता है | ऐसा उदाहरण आप यूपी, बिहार के राजनीति में आसानी से देख सकते हैं | अभी यूपी में चुनाव आने वाला है और राजनितिक पार्टियाँ अपना रंग बदलने लगी हैं , इसलिए दलितों के बहुत सारे नायक दिखेंगे जो माइक पर चिल्ला चिल्ला कर यह बताएँगे की वही उनके नायक हैं और वही समाज में बदलाव लायेंगे | जो पिछले हजारों वर्षों से चल रहा है ........


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