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बुधवार, 3 जुलाई 2024

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

 

आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्त्र के लिए वोट डाला ? जहां आरोप प्रत्यारोप ही लगाए जाते हैं और देशहित, समाजहित की कोई बात नहीं होती। 


आखिर चुनाव हो गए, सरकार बन गयी तो संसद में बहस सकारात्मक होनी चाहिए। किसने चुनाव में क्या बोला, हिन्दू मुसलमान, आरक्षण, संविधान के अलावां बेरोजगारी, सरकारी संस्थाओं में नौकरी की बजाए थर्ड पार्टी कांट्रैक्ट कर सिर्फ पीएफ अकाउंट दिखा कर रोजगार की गिनती करवाना, परीक्षा में सेंधमारी इत्यादि मुद्दा ही नहीं है। 

महंगाई ऐसा मुद्दा है जो आम जन जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है उसकी कोई जिक्र नहीं। कुछ सांसद तो ऐसे हैं जो यही बताने में लगे हैं कि हम 30 साल से सांसद है। भाई आप 30 साल से सांसद है या 50 साल से, आपके क्षेत्र में कितना विकास हुआ ? जिस क्षेत्र से सांसद है उस क्षेत्र का इतना विकास तो हो जाना चाहिए की वह अन्य लोगों के लिए मॉडल बन जाए। पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि आपका फोकस सिर्फ सांसद बनना ही रहा चाहे इस पार्टी से या उस पार्टी से जैसे भी, और जनता को ठगना था। जब चुनाव होता है तो मतदाता भगवान हो जाता है और सभी लोग मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह तरह के जतन करते हैं। जब चुनाव के परिणाम आ जाते हैं तो मतदाता की समस्या कोई समस्या नहीं होती। 

संसद राष्ट्रीय, सामाजिक और अन्य क्षेत्रों की समस्याओं को सुनने और उसका हल निकालने के लिए बातचीत करने की जगह है जहां पक्ष विपक्ष चर्चा करता है कि उस मुद्दे का क्या सोल्यूशंस है और उसका प्रभाव क्या है। जनता से जुड़े मुद्दे जनता को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन यहाँ व्यक्तिगत आरोप और बहस होने लगता है जिसमें सरकार बनाने-बिगाड़ने और पुरानी बातों को खोदकर निकालने की बात ही होती है। 


पक्ष विपक्ष की राजनीति में आम जनता का दर्द भूल गए हैं प्रतिनिधि। लोगों को अपने क्षेत्र से ज्यादा चिंता मीडिया में बने रहने, जोड़ तोड़ की राजनीति में अवसर तलाशने तक ही रह गयी है। 

लोकतन्त्र, लोक और लोग से बनता है और यदि वही खोखला होने लगे तो खतरा ज्यादा है क्योंकि समाज और देश की मजबूती सबसे पहले है और देश की सुरक्षा और आर्थिक विकास देश की मजबूती के लिए जरूरी है। यह तब होगा जब आम इंसान खुशहाल होगा। 

( Image Source : Sansad TV )

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

खाट का मजाक और देहात

खाट का मजाक और देहात

अभी कुछ दिन पहले राहुल गाँधी जी ने देवरिया , उत्तर प्रदेश से दिल्ली तक यात्रा शुरू की और साथ ही खाट सभा का आयोजन कर रहे है जो लगातार चल रहा है | पहली खाट सभा का आयोजन देवरियां में ही हुआ , जहाँ हजारों की संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे और खाट सभा में भाग लिए | नेता जी के जाने के बाद लोंगों ने वहाँ पड़ी हुई खाट अपने अपने घर उठा के ले जाने लगे | जिसको सभी टीवी चैनलों और मिडिया के अन्य माध्यमों ने बहुत ज्यादा कवरेज दिया , शायद उतना राहुल गाँधी के भाषण को न मिला हो |
पुरे दिन ट्वीटर ट्रेंड रहा #खाटसभा #खाट इत्यादि | फेसबुक पर तरह तरह के भद्दे मजाक भी बने | पर शायद खुद को पढ़ा लिखा और तकनिकी ज्ञानी मानकर लोग यह भूल गए की एक आम ग्रामीण इंसान के लिए खाट की क्या इज्जत है और उसके जीवन में कितना महत्व है |
एक शहरी इंसान जिसके पास सारी सुख सुविधाएं है वह घर बैठे ऐसे ही मजाक बना सकता है क्योंकी उसको पता ही नहीं की उसके  जीवन स्तर से निम्न जीवन स्तर जी रहे उन ग्रामीणों के लिए वह एक खाट उनके आराम से सोने के लिए एक आधार है तो एक मरीज़ को ले जाने के लिए एम्बुलेंस | आज भी जा कर देखिये दूर दराज के गाँवों को जहाँ ढंग की सड़के तक नहीं , बस गाड़ी की तो बात ही बहुत दूर की है | ढंग के स्कूल नहीं अगर हैं भी तो 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं , जहाँ लोग अपने बच्चों को प्राइमरी के बाद की शिक्षा के लिए भेजते हैं | शहर जाने के लिए 2-2 पैसे जोड़ने पड़ते हैं |
पर हम लोग तो मजाक ही उड़ायेंगे क्योंकी हमारी शहरी मानसिकता के अनुसार सभी ग्रामीण तो पिछड़े हैं | खाट तक नहीं छोड़ते , ले के भाग जाते हैं .... अब आप ही बताइए की जब सभा ख़त्म हो गयी और उस खाट का कोई उपयोग नहीं है तो लोग क्या करें ????
एक खाट उनके लिए , उस शहरी बेड से कहीं ज्यादा है तो फिर क्यों न ले जायें ???
हर बात पर मजाक आसानी से किया जा सकता है लेकिन सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं हो सकती |

दूसरों पर हँसना ज्यादा आसान होता है .....

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

विपरीत बोल , नाम का शोर

विपरीत बोल , नाम का शोर

अभी हाल में ही शोभा डे के बयान से आप सभी वाकिफ़ होंगें | पर शायद वह ओलंपिक के दबाव और खेल भावना से वाकिफ़ नहीं हैं, तभी तो खिलाड़ियों के मनोबल बढ़ाने के बजाय , उनका मनोबल तोड़ने वाला बयां देकर सुर्खियाँ बटोरने में लगी हैं |
विपरीत बोल ,नाम का शोर ... पब्लिसिटी का एक टूल है जिसे कथाकथित सेलिब्रेटी जब चाहे तब कुछ भी उल्टा बोल के अपने नाम को ट्विटर टैग में टॉप पर रहने के लिए उपयोग कर सकते हैं | ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते की इसका असर खिलाड़ियों के दिमाग पर क्या पड़ेगा | शोभा डे , या इन जैसे लोग जो समय- समय पर विपरीत बात बोल कर अपने आप को बहुत बड़ा बुद्धजीवी प्रूव करते है , 100 मीटर दौड़ने में नानी –दादी याद आ जाएँगी | ऐसे लोग खुद से निम्बू पानी बना के भी नहीं पी सकते , थकान हो जाती है, और खिलाडियों को , जो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उनको यह बोल रही की – वो पैसे, समय की बर्बादी करने और सेल्फी लेने रियो गए हैं |
शोभा डे , अगर आप भी पुरे देश का प्रतिनिधित्व करती और आपके किसी जीत या कार्य से देश का झंडा ऊँचा होता तो आपको भी फक्र होता | किसी देश का खिलाड़ी जीतता है और जब उसके देश का झंडा ऊँचा उठता है तब उस खिलाड़ी की आंखे ख़ुशी से नम हो जाती हैं | पर आपको पब्लिसिटी पसंद है ,चाहे वह जैसे मिले, जिस स्तर पर गिर कर मिले |
एक खिलाड़ी गुमनामी के अँधेरे में मेनहत करता है , उसके मेनहत को कोई नहीं देखता लेकिन वही खिलाड़ी अपने मेनहत के बल पर ओलंपिक में भाग लेता है और जीतता है तब हम जानने लगते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं | हारने पर हम उसकी मेनहत पर शक करते है, लेकिन यह भूल जाते है की जिस खेल में हमारे देश का खिलाड़ी भाग ले रहा है उसमें विश्व के अनेक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं | और उस खेल में जीतने के लिए सभी खिलाड़ी अपना 100 प्रतिशत देते हैं , परन्तु हर खेल में दो ही चीज़ होती है – या तो जीत या फिर हार | पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं की उस खिलाड़ी ने अपना 100 प्रतिशत नहीं दिया | हर खिलाडी जब वह अपने देश के लिए खेलता है तब वह जीत कर अपने देश के झंडे को ऊँचा करना चाहता है , अपने देश के लोंगों को गर्व करने का एक मौका देना चाहता है , वह चाहता है की दुनिया के लोग उसके देश को जाने |
पर कथाकथित बुद्धजीवियों को सिर्फ अपने आपको मीडिया में हाईलाइट करने से आगे जंहा दिखता ही नहीं |
काश! कभी देश के खेल की तैयारियों के बारे में सोचते की क्रिकेट को छोड़कर बाकि किस खेल के लिए लोग कितना सोचते हैं ? कितने लोंगों को ओलंपिक में गए 5 खिलाडियों का नाम याद होगा ? या कितने तरह के खेल होते है ?
मीडिया फोबिया और बेतुकी बातों को छोड़ , कभी अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश कीजिये , कुछ मेडल तो आ ही जायेंगे |
-         विन्ध्या सिंह 

सोमवार, 29 अगस्त 2016

राष्ट्रीय खेल दिवस और प्रतिभाएं

राष्ट्रीय खेल दिवस और प्रतिभाएं

फोटो: गूगल
दुनिया भर में ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से मशहूर खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद जी के जयंती के रूप में हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है | उनके प्रति भारत की जनता का सम्मान है |
हम आज के दिन  राष्ट्रीय खेल नीति के बारे में ध्यान दिलाना चाहते हैं – आपको याद होगा जब आपके बचपन में बहुत सी ऐसी प्रतिभाएं थीं , वही राजू  जो बहुत तेज़ दौड़ता था , अरे ! साधना, जो सबसे ज्यादा ऊँचा खुदती थी , आपको याद नहीं जियाउल अली जो कबड्डी में सांसें कितने लम्बी देर तक रोक लेता था या वो नुपुर निषाद जो सबसे लम्बा भाला  फेंकती थी | ऐसे लोग किसी भी खेल स्पर्धा में स्कूल या कालेज स्तर पर पदक जीतते थे | गाँव हो या शहर , हर जगह ऐसी प्रतिभाएं मिलती रहीं है जो बदस्तूर अब तक जारी है बिना किसी सहयोग के | कुछ प्रतिभाएं घर के अभिभावक के जागरूकता के कारण आगे बढ़ कर साक्षी ,सिन्धु ,जीतू और करमाकर बन जाती हैं तो कोई फटेहाल जिंदगी को सिलने में लग जाती हैं | ऐसी है हमारे देश की खेल नीति , जो 70 सालों में गाँव तो छोड़िये , शहर तक नहीं पहुँच पायी |
क्यों पदक की आश लिए हैं हम सभी ?? जब उन प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दे रहे | तरह तरह के खेल स्पर्धा के लिए समिति बनी हुई है और उस समिति में खेल से जुड़े लोग बस ढूंढने से ही मिलेंगे | मिलेंगे तो किसी नेता, किसी बिजनस मैन के रिश्तेदार या खुद नेता ही घाघ बन के वर्षो से खेल को आगे बढ़ा रहें है, तथा मीडिया में हल्ला मचा के पदक की उम्मीद लगाये बैठे हैं | हो भी क्यों न ! कम से कम पुरे ओलंपिक सत्र के दौरान टीवी पर दिखने का मौका जो मिलता है उनको |
कितनी दोहरी सोच है , खेल भावना जगती भी है तो बस ओलंपिक में पदक लाने के लिए | उसके पीछे की व्यवस्था और सहयोग को हम सोचते तक नहीं | एक खिलाड़ी जो बिना किसी सहयोग के , बहुत सी उपेक्षाओं को झेलते हुए भारत के अपेक्षाओं पर खड़ा उतरने की कोशिश करता है और हम टीवी ,न्यूज़ पेपर देख और पढ़ के बस कोसते और ताली बजाते हैं |
कब जागेगी सरकार और कब जागेंगे लोग , बहुत से साक्षी, सिन्धु , करमाकर, जीतू , बाबर गाँव –गिरांव और शहरों में अपने देश के लिए पदक जितना चाहते हैं , लेकिन उनके सामने जिंदगी जीने की जद्दोजहत भी है जो उनके खेल पर भरी पड़ जाती है |

अब सरकार के साथ ही आम जनमानस को भी इसके विषय में सोचना होगा , तभी हम सब देश के नाम को पदक तालिका में सबसे ऊपर देख पाएंगे |

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...