बुधवार, 3 जुलाई 2024

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

 

आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्त्र के लिए वोट डाला ? जहां आरोप प्रत्यारोप ही लगाए जाते हैं और देशहित, समाजहित की कोई बात नहीं होती। 


आखिर चुनाव हो गए, सरकार बन गयी तो संसद में बहस सकारात्मक होनी चाहिए। किसने चुनाव में क्या बोला, हिन्दू मुसलमान, आरक्षण, संविधान के अलावां बेरोजगारी, सरकारी संस्थाओं में नौकरी की बजाए थर्ड पार्टी कांट्रैक्ट कर सिर्फ पीएफ अकाउंट दिखा कर रोजगार की गिनती करवाना, परीक्षा में सेंधमारी इत्यादि मुद्दा ही नहीं है। 

महंगाई ऐसा मुद्दा है जो आम जन जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है उसकी कोई जिक्र नहीं। कुछ सांसद तो ऐसे हैं जो यही बताने में लगे हैं कि हम 30 साल से सांसद है। भाई आप 30 साल से सांसद है या 50 साल से, आपके क्षेत्र में कितना विकास हुआ ? जिस क्षेत्र से सांसद है उस क्षेत्र का इतना विकास तो हो जाना चाहिए की वह अन्य लोगों के लिए मॉडल बन जाए। पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि आपका फोकस सिर्फ सांसद बनना ही रहा चाहे इस पार्टी से या उस पार्टी से जैसे भी, और जनता को ठगना था। जब चुनाव होता है तो मतदाता भगवान हो जाता है और सभी लोग मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह तरह के जतन करते हैं। जब चुनाव के परिणाम आ जाते हैं तो मतदाता की समस्या कोई समस्या नहीं होती। 

संसद राष्ट्रीय, सामाजिक और अन्य क्षेत्रों की समस्याओं को सुनने और उसका हल निकालने के लिए बातचीत करने की जगह है जहां पक्ष विपक्ष चर्चा करता है कि उस मुद्दे का क्या सोल्यूशंस है और उसका प्रभाव क्या है। जनता से जुड़े मुद्दे जनता को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन यहाँ व्यक्तिगत आरोप और बहस होने लगता है जिसमें सरकार बनाने-बिगाड़ने और पुरानी बातों को खोदकर निकालने की बात ही होती है। 


पक्ष विपक्ष की राजनीति में आम जनता का दर्द भूल गए हैं प्रतिनिधि। लोगों को अपने क्षेत्र से ज्यादा चिंता मीडिया में बने रहने, जोड़ तोड़ की राजनीति में अवसर तलाशने तक ही रह गयी है। 

लोकतन्त्र, लोक और लोग से बनता है और यदि वही खोखला होने लगे तो खतरा ज्यादा है क्योंकि समाज और देश की मजबूती सबसे पहले है और देश की सुरक्षा और आर्थिक विकास देश की मजबूती के लिए जरूरी है। यह तब होगा जब आम इंसान खुशहाल होगा। 

( Image Source : Sansad TV )

मंगलवार, 15 जून 2021

#पॉलिटिकल_मानसून : बंगाल की खाड़ी का राजनीतिक मानसून यूपी और बिहार पहुँच गया है !

बिहार में ‘चिराग’ जल रहा है, और यूपी का 'हाथ' कमल पकड़ रहा है, तो हाथी वाले साथी अपनी राजनीतिक रफ़्तार बढ़ाने के लिए साइकिल की सवारी करने के जुगाड़ में हैं।

खेला होबे- खेला होबे करते-करते ममता दीदी बंगाल में सरकार क्या बनायीं, यूपी और बिहार में पार्टी तोड़ने-जोड़ने का कार्यक्रम चलने लगा। बंगाल में टीएमसी छोड़ बेटे संग भाजपा में आये मुकुल रॉय विधानसभा चुनाव के बाद वापस पुराने घर टीएमसी में चले गए। और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता जितिन प्रसाद, जो राहुल गाँधी ब्रिगेड के माने जाते थे और उनके करीबी नेताओं और सिपहसालार में शुमार थे कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी का दामन थाम लिये। तो वहीं बिहार की एक क्षेत्रीय और पारिवारिक पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी, जो राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए अपनी साख ही दांव पर लगा बैठी थी, में ऐसी फूट पड़ी की भतीजे की अध्यक्षता वाली पार्टी को चाचा ने ही तोड़ दिया। मामला इमोशन और महत्वाकांक्षा का था तो राजनीतिक चुहलबाजी तो होनी ही थी। वैसे भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में कहीं कोई हलचल होती है, तो उसकी आवाज़ दिल्ली तक सुनाई देती है। इस पार्टी के संस्थापक दिवंगत नेता रामविलास पासवान थे जिन्हें 'मौसम विज्ञानी' कहा जाता था। राजनीतिक परिस्थिति भांपते हुए वह किसी भी पार्टी में सट के कम से कम मंत्री तो बन ही जाते थे। यह गुण शायद बेटे में नहीं आया और वह सीधे-सीधे राजनीतिक पुरोधाओं को चुनौती देने लगे, तो फिर उसका खामियाज़ा भी तो भुगतना पड़ेगा। इसलिए अभी मामला लाइमलाइट में चल रहा ह
ऐसी ही एक घटना कुछ वर्ष पहले उत्तर-प्रदेश में भी हुयी थी पर यहाँ भतीजा 'जबर' मना गया, और उसने चाचा को ही पार्टी से दूर करने का प्रबंध कर दिया। लेकिन बिहार में चाचा चंठई कर दिए और चिराग पासवान की पार्टी ही उनके नीचे से दरक गयी।
अभी उत्तर-प्रदेश में एक और मामला देखने-सुनने को मिल रहा है जिसमें मायावती की पार्टी-बसपा के कुछ विधायक एक गुट बना कर अपनी पार्टी से अलग होने की फ़िराक में हैं, और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के संपर्क में हैं। मतलब समझ ही सकते हैं जो राजनीतिक मानसून बंगाल की खाड़ी से उठा वह पूर्वी विक्षोभ के सहारे उत्तर-प्रदेश तक पहुँच गया है। इस पार्टीतोड़वा टाइप काम से कोई दल फूला नहीं समा रहा होगा।
पश्चिमी विक्षोभ भी हिलोरे मार रहा है और अरब सागर की ओर से जल्द ही राजनीतिक मानसून उठने की सुगबुगाहट हो रही है। खबरें उड़ रही हैं, देखिये आगे कितनी सत्य होती हैं। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, शरद पवार से मिलकर क्षेत्रीय दलों के माध्यम से केंद्र सरकार के खिलाफ एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करने की जुगत में हैं जिसमें ममता बनर्जी एक सशक्त नेता के रूप में अगुआई कर सकती हैं। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद वह एक आयरन लेडी के रूप में उभरी हैं, शायद इसलिए उन्हें मोदी के सामने एक मजबूत नेता के तौर पर देखा जा रहा है। ( उनके अलावा कहीं कोई दिख भी तो नहीं रहा है)
पश्चिमी विक्षोभ जब आगे बढ़ेगा तो राजस्थान और पंजाब में भी गरज-चमक के साथ थोड़ी बहुत आंधी-तूफ़ान आने की संभावना है। गहलोत सरकार से नाखुश और कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट भी कभी-कभी विरोध के सुर अलाप देते हैं। उनके सुर-ताल को देखते हुए, दिल्ली में समझाईस कार्यक्रम भी जोर पकड़ लेता है। पर देखना है की कब तक यह चक्र चलता है।

पंजाब में सिद्धू की एक अपनी अलग नुरा-कुश्ती चल रही है। जिसमें वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ नगाड़ा बजा रहे हैं। आपको तो ज्ञात ही होगा की वह बीजेपी से रूठ कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन उनके अनुसार वहां उनको हल्के में लिया जाने लगा है। अपना वजन बताने के लिए वह राजनीतिक कुश्ती के दांव आजमा सकते हैं।
कुल मिला-जुला के यही खेला है, की राजनीति में कोई किसी का नहीं होता भले बचपन में एक ही थाली में खाए हों या एक-दुसरे के कपड़े पहन कर जय-वीरू बनें हों। पॉवर, पद और महत्वाकांक्षा की लड़ाई में सब कुछ जायज ही ठहराया जाता है। राजनीति का मानसून कब कहाँ से चलेगा किसी को नहीं पता होता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे खूब तेज धूप में बारिश होने लगे, और आप टोटल कन्फ्यूजिया जाते हैं।
- विन्ध्या सिंह ( vindhya08@gmail.com) Twitter: vindhya08
(वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और बदलते मानसून को देखते हुए)

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

सुशांत सिंह राजपूत के सपने और देश का युवा

एक छोटे से शहर के हाईस्कूल में पढ़ने वाला लड़का जब रोज साइकिल से स्कूल और कोचिंग पढ़ने जाता है तो एक-एक पैडल के साथ वह अपने सपनों को जीने की और आगे बढ़ने का दम लगाता है | कुछ ऐसे सपने जो वह अपनी पारिवारिक स्थिति, अपने आस-पास और दोस्तों को देखते हुए, किसी आदर्श व्यक्तित्व या अन्य कहीं से प्रेरणा लेकर बुनता है और फिर अपने अंदर ही अंदर उसे पूरा करने के लिए जूझता है | कुछ ऐसे ही सुशांत भी थे | उन्हीं युवाओं के बीच से निकला एक युवा जो अपने सपनों को जीना चाहता था और वह कदम-दर-कदम आगे भी बढ़ रहा था | फिर अचानक वह दुनियां छोड़ कर चला गया | कैसे गया यह ठीक-ठीक कोई भी नहीं बता सकता ....

लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करने वाला इंसान, खुद से खुद को बनाने वाला इन्सान कभी ख़ुदकुशी जैसी सोच नहीं रखता है | उसको यह पता होता है की वह कर क्या रहा है और करना क्या है | अपनी मंजिल को देखने वाला इंसान बुरे और कठिन परिस्थितियों से नहीं घबराता | कठिन समय से निकलने के लिए रास्ते खोजता है पर वह रास्ता जीवन से इतिश्री का नहीं होता | क्योंकि वह जिंदादिल इंसान होता है उसे जीवन को जीने में मजा आता है और उसे उपर वाले पर भरोसा होता है | अपने आस पास आप ऐसे लोगों को देख सकते हैं ... आपको ऐसे इंसान मिल जायेंगे जिन्हें आप जिंदादिल कह सकें, जिन्हें आप यह कह सकें की- यार ! मस्त इंसान है |

चूँकि सुशांत हम लोगों जैसे युवाओं में से ही थे तो उनका संघर्ष, उनके काम, उनकी सोच, उनका व्यवहार अपने उम्र वर्ग के युवाओं जैसा ही रहा होगा | आज युवाओं में इसीलिए आक्रोश भी है की वह ऐसे कैसे जा सकते है जैसी स्टोरी चलायी जा रही है | जब छोटे शहर से निकला युवा अपने सपनों को लेकर दिल्ली, मुंबई, बंगलौर जैसे बड़े शहरों में आता है तो वह अपने जीने और व्यवहार का तरीका नहीं बदलता | वह सीखता है की उसे किस तरह अपनी मेहनत से उन सपनों को पूरा करना है जिनके लिए वह अपना भरा पूरा परिवार, बचपन के यार और खुबसूरत यादों को छोड़ कर आ गया है |

Photo:  Googleसुशांत किसी के आदर्श हों न हों लेकिन उनके सपने देश का प्रत्येक युवा अपने तरीके से देखता है | कौन युवा सफल नहीं होना चाहता ? कौन युवा अपना और अपने परिवार का नाम ऊँचा नहीं उठाना चाहता? कौन युवा अपने सपनों के लिए जीना नहीं चाहता ? सबके दिल दिमाग में सफल होना और आगे बढ़ना ही होता है | सब लोग खुश रहना चाहते है, अपनी जरूरतों को पूरा करना चाहते है, अपने सपनों को जीना चाहते है |

अब करोड़ों युवाओं में कुछ लोग अपने सपनों को पूरा कर पाते है तो अधिकांश लोग नहीं कर पाते है लेकिन खुद को उस व्यक्ति से रिलेट कर लेते हैं जैसे लोग फिल्म देखते देखते अपनी खुद की कहानी जोड़ लेते हैं |

सुशांत का इस तरह से जाना भला कोई भी कैसे पचा सकता है जब वह कहानी हर युवा की हो ? कोई कैसे किसी भी स्टोरी पर भरोसा कर ले ? दिल नहीं मान सकता और दिमाग तर्क करना नहीं छोड़ सकता ...

वह जहाँ भी रहें खुश रहें लेकिन उनका जाने का वक़्त नहीं था | वह अभी आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणा बनते, वह अपने संघर्ष की कहानियों से प्रेरित कर न जाने कितने युवाओं को सपने बुनने और जीने की कला सिखाते , न जाने कितने युवाओं को उस असफलता के अंधकार से निकालते जिनके सपने पुरे नहीं हो पाते |

Photo:Google

मुझे उम्मीद है उन्हें न्याय मिलेगा | पर अब  उनको क्या फर्क पड़ेगा न्याय या अन्याय से .... हाँ ! उस पिता को उस न्याय से एक संबल जरुर मिलेगा, क्योंकि उनके पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा है | कितने लाड-प्यार से अपने बेटे को बड़ा होते हुए देखे होंगें | उनकी कितने जिज्ञासाओं को शांत किये होंगे | उनके सपनों को समझे होंगे | उनके दिल की आवाज़ को सुने होंगे ...... वह जहाँ भी होंगें देख रहे होंगे कि उनकों चाहने वाले कितने लोग हैं | वह अपना सोशल मीडिया अकाउंट देखकर अपने चाहने वालों का अनुमान लगाते रहे होंगे लेकिन सच आज के युवाओं के आक्रोश और आंशुओं में देखा जा सकता है |


सोमवार, 2 अप्रैल 2018

अपने पड़ोसियों को नज़रंदाज करता भारत



Image Source: Google


चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, भूटान, नेपाल देश भारत के पड़ोसी देश हैं और बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे हैं की पड़ोसियों से रिश्ते मधुर रखना चाहिए, क्योंकि दूर के रिश्तेदार बाद में आते हैं लेकिन पड़ोसी तुरंत मौके पर उपस्थित रहते हैं |
पर शायद अब भारत यह भूल गया है और उसे पड़ोसियों की कोई फ़िक्र नहीं | बस, अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भर रहा है जो खतरे की घंटी है | भारत भले ही चीन के साथ अपने संबंधों को सहज देख रहा हो , पर चीन इसे अलग नजरिये से देखता है इसे आप सीमा पर हुए गतिरोध से समझ सकते हैं | चीन हमेशा से प्रसारवादी नीति का समर्थक रहा है , यहाँ तक की भारत के साथ अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर क्षेत्र के हिस्सों को लेकर अपना दावा करता रहा है और वह इसके प्रति सतर्क भी है | हाल के दो वर्षों की घटनाओं से आप यह समझ सकते हैं | हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी मुसीबत में पड़ने के बाद ही आया जो इतने सालों बाद भी बस एक जुमला बन के रह गया है |

भारत के यह पड़ोसी अब पराये बन रहे हैं , ताज़ा मामला मालदीव का ही देखें तो, दो टूक समान अधिकार शब्दों के माध्यम से चीन ने भारत को इस मामले से दूर ही कर दिया जबकि भारत ने मालदीव के तख्तापलट के संकट में भरपूर साथ दिया था | अब वहाँ के विपक्ष में भारत के प्रति नकारात्मकता पनपने लगी है | बगल में श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लगभग चीन को ही सौंप चुका है और भारी निवेश भी कर रहा है | वहीं चीन ने म्यांमार के साथ 24 अरब डॉलर का वित्तीय समझौता किया है तथा वहां एक बंदरगाह का निर्माण भी कर रहा है | नेपाल की मार्क्सवादी ओली सरकार का झुकाव चीन की तरफ है और चीन भारी मात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है , सिर्फ यही नहीं चीन से नेपाल के लिए ट्रेन की लाइन बिछाने पर भी काम चल रहा है इस तरह चीन की पहुँच नेपाल के रास्ते भारत के सीमा तक होगी | भूटान, एक ऐसा देश है जो भारत का साथ दे रहा है लेकिन चीन के लगातार दबाव को वह सहन करता है और वह दिन दूर नहीं जब भूटान भारत के पाले से निकल कर चीन की ओर खड़ा होगा | बांग्लादेश में अभी सबसे बड़ा निवेशक चीन ही है , भले इस देश की सीमायें भारत से जुड़ी हैं लेकिन वहां का राजनीतिक समीकरण भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है | रही बात पाकिस्तान की तो अब यह बात धीरे-धीरे पूरा विश्व समुदाय जानने लगा है की पाकिस्तान अब पूरी तरह चीन के साथ है जहाँ चीन यहाँ अनेक स्तर पर निवेश कर रहा है वहीँ ग्वादर बंदरगाह को बनाकर हिन्द महासागर तक अपनी पहुँच बनाते हुए स्पेशल आर्थिक जोन बनाते हुए पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते सुगम यातायात व्यवस्था के लिए सड़क निर्माण भी कर रहा है | भारत ने इसपर अपनी आपत्ति भी जताई है लेकिन यह बहुत कारगर नहीं रही है |

पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादियों के पनाह के देश के रूप में घोषित कराने में भारत को भले सफलता मिली हो लेकिन चीन उसके विकास में भरपूर सहयोग दे रहा है | यदि पाकिस्तान के साथ भारत का किसी भी तरह का युद्ध होता है तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना होगा | चीन अपने बड़े रणनीति के अनुसार भारत के सीमा पर अतिक्रमण कर उकसा रहा है और इधर पाकिस्तान घुसपैठ करा कर भारत के नाक में दम कर रखा है | भारत अपने विदेश नीति में पिछड़ता जा रहा है और चीन को एक तरह से वाक ओवर देता जा रहा है | चीन विश्व मंच पर भी भारत की खिलाफत करता रहा है चाहे वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देश की सदस्यता हासिल करना हो |


साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में ज्यादा से ज्यादा निवेश करके भारत को चारो ओर से घेरता जा रहा है और भारत अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भरता जा रहा है | चीन खुद को एशिया के एकमात्र  महाशक्ति के रूप में देखता है और उसी अनुरूप आचरण भी कर रहा है , वह कभी नहीं चाहेगा की भारत उसके समकक्ष खड़ा हो सके | उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को समर्थन देकर वह अमेरिका जैसे देश को आँख दिखाकर यह बताना चाहता है की वह उसके बराबर है | भारत का पड़ोसियों को अनदेखी करना अमेरिकी दोस्ती पर भारी पड़ेगी | भारत को अब भी सचेत होने की जरुरत है , अपने पड़ोसियों को समझने की जरुरत है अन्यथा चीन, भारत को एक ड्रैगन की तरह निगल जायेगा |  

(यह हमारे निजी विचार हैं , विदेश नीति एक बहुत बड़ा कांसेप्ट है और मैं उसके आस-पास भी नहीं फटकता , लेकिन विभिन्न समाचारों एवं लेखों इत्यादि के माध्यम से इस विषय में लिखने का विचार आया तो लिख दिया | यदि आप किसी बात से असहमत हो तो आप कमेंट में जरुर लिखें , यह जरुरी नहीं की मैं इस मुद्दे पर ज्यादा जनता हूँ आप कुछ भी अच्छा लिखेंगे तो यह मेरे लिखने में और सुधार ही करेगा |)


गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

सिंगुर का किसान ‘न घर का रहा न घाट का’



       फोटो : गूगल

सिंगुर , शायद आपने नाम सुना हो !
एक समय ऐसा था जब सभी समाचार पत्र , न्यूज़ चैनेल इस नाम से अपनी टीआरपी बढ़ाने में लगे हुए थे | लेकिन आज कोई सिंगुर की हालत पर बात नहीं करता | पश्चिम बंगाल का यह जगह कभी टाटा नैनो की लखटकिया परियोजना के लिए पुरे देश में चर्चा का विषय रहा | साथ ही यह किसानों की जमीन से जुड़ा मुद्दा भी रहा , कुछ किसानों ने खुद अपनी जमीन इस परियोजना के लिए दे दी, तो कुछ सरकार ने जबरदस्ती ले लिया | आन्दोलन हुए, राजनीति हुयी और फिर वाम सरकार को कई दशकों का शासन छोड़ना पड़ा | ममता बनर्जी , इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयीं, सुप्रीमकोर्ट तक लड़ाई लड़ी गयी और फिर किसानों के पक्ष में आदेश भी आया ,तत्पश्चात  नैनों प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा जो गुजरात चला गया | जमीन वापस किसानों को दी जाने लगी और साथ ही प्रभावित किसानों को प्रति महीने कुछ रूपये और सस्ते अनाज भी | ..... जिस जमीन पर यह परियोजना बन रही थी उसके बहुत सारे हिस्से पर कार्य चल रहा था जो लगभग आधा के करीब पहुँच गया था, जिस जमीन पर लहलहाती खेती हुआ करती थी वहां बस कंक्रीट के ढांचे और खम्भे खड़े दिखाई देने लगे | सड़कें पक्की बन गयी और ड्रेनेज सिस्टम भी बन गया .... मतलब पूरा आधार तैयार हो गया | फिर ........

किसानों को जमीन वापस दे दी गयी , अब किसान ‘न घर का रहा न घाट का’ | उस मजबूत बने कंक्रीट के आधार पर वह दुबारा खेती नहीं कर सकता और उसे हटाने में मानव श्रम काफी नहीं हैं तथा सरकार उसे हटाने के लिए कोई प्रयास भी नहीं कर रही है यदि मनरेगा के तहत उसे हटाने की कवायद चल भी रही है तो वह कितने वर्षों में हटेगा यह आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं | क्या होगा सिंगुर के किसानों की हालत ? आप सोच के ही दुखी हो जायेंगे , वह तो भुक्तभोगी हैं | जिन किसानों की आजीविका खेती से चलती थी वह आज मजदुर बन गए , कुछ ने उम्मीद लगायी होगी की फैक्ट्री चलेगी तो रोजगार के कुछ न कुछ साधन बन ही जायेंगे , बन ही जाते | लेकिन वह भी नहीं हुआ ... अब उस क्षेत्र की जनता को वहीँ के नेताओं ने उस हालत में ला दिया जिसे वह कभी सपने में भी नहीं सोचे होंगें | ऐसे अदूरदर्शी फैसले से लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे न तो सरकार जानना चाहती है और न ही अधिकारी | देश बोलने से नहीं करने से बदलेगा .... पर किसी को क्या फर्क पड़ता है जब सिंगुर के किसान का लड़का अपनी पढ़ाई छोड़ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में मजदूरी करे, रिक्शा चलाये , पकौड़े बेचे , और एक ऐसी जिंदगी जिए जिसे वह कभी जीना नहीं चाहता रहा हो | एक ऐसे परेशानी से गुजरे जिसे स्थानीय राजनेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए खड़ी किये हों | भारत की अधिकांश जनता अभी भी कृषि पर जीवनयापन कर रही है लेकिन आप उसे वहां भी जीने नहीं देना चाहते | एक किसान होना उस भगवान होने जैसा है जो हमें अन्न देता है लेकिन आप उसके ही खेत को छीन कर उसे ही भूमिहीन बना दिए , मजदुर बना मज़बूरी की जिंदगी जीने के लिए बेबस कर दिए | यदि इस तरह किसी के जीवन को बर्बाद कर विकास करना चाहते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब पुरे देश में असंतोष होगा और लोग जीने के लिए एक दुसरे को मारते फिरेंगे | किसी विशेष क्षेत्र में अपराध बढ़ने का यह भी एक कारण होता है | हम किसी फैक्ट्री या परियोजना का विरोध नहीं करते , हाँ ! बस वह वहां की जनता के हित के लिए होना चाहिए ..... भविष्य में कोई सिंगुर न बने इस उम्मीद के साथ , जय हिन्द ! 
Reference : www.thewirehindi.com

शुक्रवार, 5 मई 2017

बर्बरता के लिए कोई माफ़ी नहीं - सुप्रीमकोर्ट

आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने यह साबित कर दिया की देश के न्यायतंत्र में देर भले ही है पर अंधेर नहीं है |
निर्भया केस में कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को जस का तस रख कर , दोषियों के मौत की सजा को बरकरार रखा है |
यह निर्णय एक नज़ीर है और आने वाले समय में कोई भी ऐसी गन्दी और क्रूर हरकत करने के पहले १००० बार सोचेगा |
जिस तरह कोर्ट ने इसे बर्बर कृत्य बताते हुए इसे क्रूरता की सुनामी के रूप में परिभाषित किया उससे इस केस की गंभीरता प्रदर्शित होती है |
निर्भया के माँ पिता के संग भारत के प्रत्येक संवेदनशील लोंगों को यह फैसला बहुत ही राहत देने वाला है |
निर्भया के पिता ने कहा भी – “ हम सुप्रीमकोर्ट के निर्णय से बहुत खुश है , देर सही पर मुकम्मल निर्णय है |”

निःसंदेह यह निर्णय न्यायतंत्र में एक विश्वास जगाता है और इस बात पर विराम लगाता है की न्याय व्यवस्था बहुत ही लचर हो चुकी है |

बुधवार, 3 मई 2017

नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों का भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए

सुप्रीमकोर्ट द्वारा सराहनीय पहल ! शिक्षामित्रों को किया जा सकता है बर्खास्त | अखिलेश सरकार ने वोट की राजनीति में नौनिहालों के जीवन से जो खिलवाड़ शुरू किया था , अब वक़्त आ गया है की यह सब बंद हो | पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षकों की जगह शिक्षामित्रों को रखकर पुरे बेसिक शिक्षा के साथ मजाक किये अखिलेश सरकार | अब यूपीटेट २०११ के सभी उत्तीर्ण लोंगों को पूर्ण समायोजन किया जाना चाहिए | शिक्षामित्रों से कोई विरोध नहीं है लेकिन जो गलत है वह गलत है उनकी नियुक्ति ही अवैध और असंवैधानिक तरीके से हुयी |

साथ ही प्राईमरी स्कूल के बच्चों के ड्रेस के बारे में भी बात करना चाहता हूँ | आप देखते होंगे की छोटे प्यारे बच्चे स्कूल ड्रेस में खाकी रंग का पेंट और शर्ट दोनों ही पहने हुए होते हैं ऐसे लगता है की सब मजदूर बनने या पुलिस बनना चाहते है | आखिर अखिलेश सरकार ऐसा ड्रेस कोड बना के क्या सन्देश देना चाहती थी ??? की सब बच्चे नॉन स्किल लेबर और पुलिस होमगार्ड बनने से ज्यादा ना सोच पाएं ??? उनके सोच को बस वहीँ तक समेट दें की वह आगे की सोचे ही ना और हम उत्तर प्रदेश में राज करते रहें | जरा सोचिये इन सब चीजों का एक बच्चे के ऊपर क्या असर पड़ता है तब समझेंगे ... इस तरह का ड्रेस बदलना चहिये | उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को सुधार कर ही प्रदेश को उदीयमान बनाया जा सकता है , तभी असली विकास होगा | नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों की जिंदगी और भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए |

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...