गुरुवार, 1 सितंबर 2016

विपरीत बोल , नाम का शोर

विपरीत बोल , नाम का शोर

अभी हाल में ही शोभा डे के बयान से आप सभी वाकिफ़ होंगें | पर शायद वह ओलंपिक के दबाव और खेल भावना से वाकिफ़ नहीं हैं, तभी तो खिलाड़ियों के मनोबल बढ़ाने के बजाय , उनका मनोबल तोड़ने वाला बयां देकर सुर्खियाँ बटोरने में लगी हैं |
विपरीत बोल ,नाम का शोर ... पब्लिसिटी का एक टूल है जिसे कथाकथित सेलिब्रेटी जब चाहे तब कुछ भी उल्टा बोल के अपने नाम को ट्विटर टैग में टॉप पर रहने के लिए उपयोग कर सकते हैं | ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते की इसका असर खिलाड़ियों के दिमाग पर क्या पड़ेगा | शोभा डे , या इन जैसे लोग जो समय- समय पर विपरीत बात बोल कर अपने आप को बहुत बड़ा बुद्धजीवी प्रूव करते है , 100 मीटर दौड़ने में नानी –दादी याद आ जाएँगी | ऐसे लोग खुद से निम्बू पानी बना के भी नहीं पी सकते , थकान हो जाती है, और खिलाडियों को , जो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उनको यह बोल रही की – वो पैसे, समय की बर्बादी करने और सेल्फी लेने रियो गए हैं |
शोभा डे , अगर आप भी पुरे देश का प्रतिनिधित्व करती और आपके किसी जीत या कार्य से देश का झंडा ऊँचा होता तो आपको भी फक्र होता | किसी देश का खिलाड़ी जीतता है और जब उसके देश का झंडा ऊँचा उठता है तब उस खिलाड़ी की आंखे ख़ुशी से नम हो जाती हैं | पर आपको पब्लिसिटी पसंद है ,चाहे वह जैसे मिले, जिस स्तर पर गिर कर मिले |
एक खिलाड़ी गुमनामी के अँधेरे में मेनहत करता है , उसके मेनहत को कोई नहीं देखता लेकिन वही खिलाड़ी अपने मेनहत के बल पर ओलंपिक में भाग लेता है और जीतता है तब हम जानने लगते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं | हारने पर हम उसकी मेनहत पर शक करते है, लेकिन यह भूल जाते है की जिस खेल में हमारे देश का खिलाड़ी भाग ले रहा है उसमें विश्व के अनेक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं | और उस खेल में जीतने के लिए सभी खिलाड़ी अपना 100 प्रतिशत देते हैं , परन्तु हर खेल में दो ही चीज़ होती है – या तो जीत या फिर हार | पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं की उस खिलाड़ी ने अपना 100 प्रतिशत नहीं दिया | हर खिलाडी जब वह अपने देश के लिए खेलता है तब वह जीत कर अपने देश के झंडे को ऊँचा करना चाहता है , अपने देश के लोंगों को गर्व करने का एक मौका देना चाहता है , वह चाहता है की दुनिया के लोग उसके देश को जाने |
पर कथाकथित बुद्धजीवियों को सिर्फ अपने आपको मीडिया में हाईलाइट करने से आगे जंहा दिखता ही नहीं |
काश! कभी देश के खेल की तैयारियों के बारे में सोचते की क्रिकेट को छोड़कर बाकि किस खेल के लिए लोग कितना सोचते हैं ? कितने लोंगों को ओलंपिक में गए 5 खिलाडियों का नाम याद होगा ? या कितने तरह के खेल होते है ?
मीडिया फोबिया और बेतुकी बातों को छोड़ , कभी अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश कीजिये , कुछ मेडल तो आ ही जायेंगे |
-         विन्ध्या सिंह 

आज़ाद भारत और महिला सशक्तिकरण

आज़ाद भारत और महिला सशक्तिकरण

आजादी के 70  सालों के बाद भी ,एक समतामूलक स्वस्थ समाज बनाने में भारत की प्रगति धीमी और निराशाजनक ही है। महिलाओं के प्रति भेदभाव तेज़ी से बढ़ रहा है और जाति-धर्म, अमीर- गरीब, शहरी-ग्रामीण विभाजक भी उसी रूप में मौजूद है। आज 2016 में बहुत से न्यायिक प्रावधानों के बाद भी यह कहा जा सकता है कि चीजें पहले से बेहतर हैं | फिर भी कुछ बातें बिलकुल भी नहीं बदली हैं । अपने ठोस आर्थिक और सामाजिक आधार पर पुरुष, पुरुष के रूप में सुरक्षित है | और स्त्रियाँ अभी बहुत दूर हैं | आज पढ़ी लिखी महिलाएं यह महसूस कर रही हैं कि लैंगिक समानता और बराबर की हिस्सेदारी नहीं मिलेगी तब तक महिला सशक्तीकरण केवल हवाई  स्तर पर ही रहेगा ।
जहां शिक्षा, रोजगार के अवसर और सोशल नेटवर्क ने महिलाओं को मुखरता प्रदान की है, वहीं बहुत सी महिलाएं इज्जत, परिवार,धर्म, परंपरा, संस्कृति के नाम पर अब भी चुपचाप अन्याय सहती जा रही हैं। कुछ विचार और परम्पराएं इतनी गहरे से बसी हैं कि स्वयं महिलाओं द्वारा भी पक्षपातपूर्ण रवैये को पक्षपात के तौर पर नहीं देखा जाता । एक महिला का एक महिला के प्रति यह एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार है | महिलाएं अपनी स्थिति और अपने पद के अनुरूप दुसरे महिलाओं से अनुचित व्यवहार करने लगती हैं और अगर कोई पुरुष अन्याय करता है तो मूक दर्शक बनकर मौन स्वीकृति देती हैं | समाज में ऐसे बहुत सारे रिश्ते हैं जो पारिवारिक रूप में या सामाजिक रूप में या कार्यस्थल पर पद  के रूप में विद्यमान है |
आज भारत में महिला सशक्तिकरण सरकारी नारा है, जो हर पार्टी अपने  घोषणापत्र में प्रत्येक चुनाव  में लाती हैं और चुनाव बाद भूल जाती हैं । इसके बावजूद बाईसवीं सदी में भी भारतीय महिलाएं ,जो कानून द्वारा सुरक्षित लगती हैं , मीडिया द्वारा महिमामंडित की जाती हैं और सामाजिक एक्टिविस्टों द्वारा जिनकी हिमायत की जाती है और दर्जनों सभाएं कर हल्ला मचाया जाता है , वो आज भी दोयम दर्जे की नागरिक ही बनी हुई हैं , ग्रामीण इलाकों में तो पूरी तरह । ( शहरों में भी कुछ हद तक ऐसा ही है )
इसके लिए लोगों को, मुख्य रूप से स्वयं महिलाओं को , महिलाओं की जरूरतों के प्रति और उनसे की जा रही अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील बनने की आवश्यकता है। समाज में औरत और मर्द की भूमिका निर्धारित करने वाली कठोर रेखाओं को मिटाने और धूमिल करने की जरुरत है । जिसमें खुद महिलाओं की ही भूमिका महत्वपूर्ण है |
-विन्ध्या सिंह

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...