आज़ाद भारत और महिला सशक्तिकरण
आजादी के 70 सालों
के बाद भी ,एक समतामूलक स्वस्थ समाज बनाने में भारत की
प्रगति धीमी और निराशाजनक ही है। महिलाओं के प्रति भेदभाव तेज़ी से बढ़ रहा है और
जाति-धर्म, अमीर-
गरीब, शहरी-ग्रामीण विभाजक भी उसी रूप में मौजूद है। आज 2016 में बहुत से न्यायिक प्रावधानों के बाद भी यह कहा
जा सकता है कि चीजें पहले से बेहतर हैं | फिर भी कुछ बातें
बिलकुल भी नहीं बदली हैं । अपने ठोस आर्थिक और सामाजिक आधार पर पुरुष, पुरुष के रूप में सुरक्षित है | और स्त्रियाँ अभी
बहुत दूर हैं | आज पढ़ी लिखी महिलाएं यह महसूस कर रही हैं कि
लैंगिक समानता और बराबर की हिस्सेदारी नहीं मिलेगी तब तक महिला सशक्तीकरण केवल
हवाई स्तर पर ही रहेगा ।
जहां शिक्षा, रोजगार
के अवसर और सोशल नेटवर्क ने महिलाओं को मुखरता प्रदान की है, वहीं बहुत सी महिलाएं इज्जत, परिवार,धर्म, परंपरा, संस्कृति
के नाम पर अब भी चुपचाप अन्याय सहती जा रही हैं। कुछ विचार और परम्पराएं इतनी गहरे
से बसी हैं कि स्वयं महिलाओं द्वारा भी पक्षपातपूर्ण रवैये को पक्षपात के तौर पर
नहीं देखा जाता । एक महिला का एक महिला के प्रति यह एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार है | महिलाएं अपनी स्थिति और अपने पद
के अनुरूप दुसरे महिलाओं से अनुचित व्यवहार करने लगती हैं और अगर कोई पुरुष अन्याय
करता है तो मूक दर्शक बनकर मौन स्वीकृति देती हैं | समाज में
ऐसे बहुत सारे रिश्ते हैं जो पारिवारिक रूप में या सामाजिक रूप में या कार्यस्थल
पर पद के रूप में विद्यमान है |
आज भारत में ‘महिला
सशक्तिकरण’ सरकारी
नारा है, जो हर पार्टी अपने घोषणापत्र में प्रत्येक
चुनाव में
लाती हैं और चुनाव बाद भूल जाती हैं । इसके बावजूद बाईसवीं सदी में भी भारतीय
महिलाएं ,जो कानून द्वारा सुरक्षित लगती हैं
, मीडिया द्वारा महिमामंडित की जाती हैं और सामाजिक
एक्टिविस्टों द्वारा जिनकी हिमायत की जाती है और दर्जनों सभाएं कर हल्ला मचाया
जाता है , वो आज भी दोयम दर्जे की नागरिक ही बनी हुई हैं , ग्रामीण
इलाकों में तो पूरी तरह । ( शहरों
में भी कुछ हद तक ऐसा ही है )
इसके लिए लोगों को, मुख्य रूप से स्वयं महिलाओं को , महिलाओं
की जरूरतों के प्रति और उनसे की जा रही अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील बनने की
आवश्यकता है। समाज में औरत और मर्द की भूमिका निर्धारित करने वाली कठोर रेखाओं को
मिटाने और धूमिल करने की जरुरत है । जिसमें खुद महिलाओं की ही भूमिका महत्वपूर्ण है |
-विन्ध्या सिंह

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