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चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार,
मालदीव, भूटान, नेपाल देश भारत के पड़ोसी देश हैं और बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे
हैं की पड़ोसियों से रिश्ते मधुर
रखना चाहिए, क्योंकि दूर के रिश्तेदार बाद में आते हैं लेकिन पड़ोसी तुरंत मौके पर
उपस्थित रहते हैं |
पर शायद अब भारत यह भूल गया है और उसे
पड़ोसियों की कोई फ़िक्र नहीं | बस, अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भर रहा है जो
खतरे की घंटी है | भारत भले ही चीन के साथ अपने संबंधों को सहज देख रहा हो , पर
चीन इसे अलग नजरिये से देखता है इसे आप सीमा पर हुए
गतिरोध से समझ सकते हैं | चीन हमेशा से प्रसारवादी नीति का
समर्थक रहा है , यहाँ तक की भारत के साथ अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर क्षेत्र
के हिस्सों को लेकर अपना दावा करता रहा है
और वह इसके प्रति सतर्क भी है | हाल के दो वर्षों की घटनाओं से आप यह समझ सकते हैं
| हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी मुसीबत में पड़ने के बाद ही आया जो इतने सालों बाद
भी बस एक जुमला बन के रह गया है |
भारत के यह पड़ोसी अब पराये बन रहे हैं , ताज़ा मामला
मालदीव का ही देखें तो, दो टूक ‘समान
अधिकार’ शब्दों के माध्यम से चीन ने भारत को इस
मामले से दूर ही कर दिया जबकि भारत ने मालदीव के तख्तापलट के संकट में भरपूर साथ
दिया था | अब वहाँ के विपक्ष में भारत के प्रति नकारात्मकता पनपने लगी है | बगल
में श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लगभग चीन को ही सौंप चुका है और भारी निवेश
भी कर रहा है | वहीं चीन ने म्यांमार के साथ 24 अरब डॉलर का वित्तीय समझौता किया
है तथा वहां एक बंदरगाह का निर्माण भी कर रहा है | नेपाल की मार्क्सवादी ओली सरकार
का झुकाव चीन की तरफ है और चीन भारी मात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में
निवेश कर रहा है , सिर्फ यही नहीं चीन से नेपाल के लिए ट्रेन की लाइन बिछाने पर भी
काम चल रहा है इस तरह चीन की पहुँच नेपाल के रास्ते भारत के सीमा तक होगी | भूटान,
एक ऐसा देश है जो भारत का साथ दे रहा है लेकिन चीन के लगातार दबाव को वह सहन करता
है और वह दिन दूर नहीं जब भूटान भारत के पाले से निकल कर चीन की ओर खड़ा होगा | बांग्लादेश
में अभी सबसे बड़ा निवेशक चीन ही है , भले इस देश की सीमायें भारत से जुड़ी हैं
लेकिन वहां का राजनीतिक समीकरण भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है | रही बात
पाकिस्तान की तो अब यह बात धीरे-धीरे पूरा विश्व समुदाय जानने लगा है की पाकिस्तान
अब पूरी तरह चीन के साथ है जहाँ चीन यहाँ अनेक स्तर पर निवेश कर रहा है वहीँ ग्वादर
बंदरगाह को बनाकर हिन्द महासागर तक अपनी पहुँच बनाते हुए स्पेशल आर्थिक जोन बनाते
हुए पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते सुगम यातायात व्यवस्था के लिए सड़क निर्माण भी कर
रहा है | भारत ने इसपर अपनी आपत्ति भी जताई है लेकिन यह बहुत कारगर नहीं रही है |
पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादियों के पनाह के
देश के रूप में घोषित कराने में भारत को भले सफलता मिली हो लेकिन चीन उसके विकास
में भरपूर सहयोग दे रहा है | यदि पाकिस्तान के साथ भारत का किसी भी तरह का युद्ध
होता है तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना होगा | चीन अपने बड़े रणनीति के अनुसार भारत
के सीमा पर अतिक्रमण कर उकसा रहा है और इधर पाकिस्तान घुसपैठ करा कर भारत के नाक
में दम कर रखा है | भारत अपने विदेश नीति में पिछड़ता जा रहा है और चीन को एक तरह
से वाक ओवर देता जा रहा है | चीन विश्व मंच पर भी भारत की खिलाफत करता रहा है चाहे
वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देश की
सदस्यता हासिल करना हो |
साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में ज्यादा से ज्यादा
निवेश करके भारत को चारो ओर से घेरता जा रहा है और भारत अपने गुमान में आगे बढ़ने
का दंभ भरता जा रहा है | चीन खुद को एशिया के एकमात्र महाशक्ति के रूप में देखता है और उसी अनुरूप
आचरण भी कर रहा है , वह कभी नहीं चाहेगा की भारत उसके समकक्ष खड़ा हो सके | उत्तर
कोरिया और पाकिस्तान को समर्थन देकर वह अमेरिका जैसे देश को आँख दिखाकर यह बताना
चाहता है की वह उसके बराबर है | भारत का पड़ोसियों को अनदेखी करना अमेरिकी दोस्ती
पर भारी पड़ेगी | भारत को अब भी सचेत होने की जरुरत है , अपने पड़ोसियों को समझने की
जरुरत है अन्यथा चीन, भारत को एक ड्रैगन की तरह निगल जायेगा |
(यह हमारे निजी विचार हैं , विदेश नीति एक बहुत बड़ा कांसेप्ट है और मैं उसके आस-पास भी नहीं फटकता , लेकिन विभिन्न समाचारों एवं लेखों इत्यादि के माध्यम से इस विषय में लिखने का विचार आया तो लिख दिया | यदि आप किसी बात से असहमत हो तो आप कमेंट में जरुर लिखें , यह जरुरी नहीं की मैं इस मुद्दे पर ज्यादा जनता हूँ आप कुछ भी अच्छा लिखेंगे तो यह मेरे लिखने में और सुधार ही करेगा |)

