मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बाबाओं का पीआर

बाबाओं का पीआर 



अनेक बुद्धिजीवी बाबाओं को गरीयाने का अपना कर्तव्य मान बैठे हैंलेकिन यह भूल जाते हैं की बाबाओं के पास बहुत सारे जुगाड़ है, जिसे आप मॉडर्न भाषा में पीआर कह सकते हैं | भारत की जनता हमेशा से संतोंभिक्षुओंसूफ़ियोंका देश रहा है | ऋषियों की परम्परा बहुत पुरानी रही है | बुद्धशंकराचार्यगांधीबिनोबा भावेजयप्रकाश नारायण,  हर काल-चक्र में भारत की जनता इस तरह के लोगों को सुनती रही है जो नेता बनने का ढोंग नहींबल्कि संत-सन्यासी दिखते हों |( आज के दौर की विकृत परिभाषा से अलग जिसमें खुद बाबाओं का भी योगदान है)

बाबा लोंगों के ख़िलाफ़ ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैंसवाल किसी के खिलाफ उठाये जा सकते हैं लोकतंत्र में यह होना भी चाहिए | भारत जैसे विविधता वाले देश में, गुरू परम्परा होने की वजह से बाबा लोंगों की पुछ हमेशा बरक़रार रहेगी शायद इसे चुनौती भी दिया जाये, तो पत्थर पर सिर मारने वाली बात होगी |
पहले बाबा लोग दुनियादारी से दूर एकांतवाश में भजन-कीर्तन करते हुए आम जनता को अच्छी बातों का प्रवचन देकर अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते थे | (आज के दौर में भी ऐसे कुछ लोग मिल सकते हैं) परन्तु टीवी के बढ़ते प्रभाव ने जैसे इनके सेक्टर में भी बूम ला दिया और उसका साथ दिया इन्टरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने | तरह-तरह के चैनलों के माध्यम से यह बाबा लोग धीरे धीरे लोंगों के घर के अन्दर तक पहुंचें और आज इनके आश्रमों द्वारा बनाये गए जैविक खाद्य पदार्थ लोंगो के रसोई और दैनिक जीवन का हिस्सा बन रहे हैं | ऑनलाइन स्टोर से लेकर रिटेलशॉप तक खुल गए हैं | दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली लगभग प्रत्येक खाद्य सामग्री इन बाबाओं के कम्पनी रूपी आश्रम में बनायीं जा रही हैं,  और स्वदेशी के नाम पर बेची जा रही है |
यह बाबा लोंगों का पीआर ही है जो यह संभव बना रहा है | बिना किसी पीआर एजेंसी को हायर किये और न ही विशेष विज्ञापन द्वारा, खुद से ही ऐसा जनतंत्र खड़ा कर दिए हैं की उनकी कोई खिलाफत करे तो आस-पास के लोग आपत्ति करने लगते हैं | और शायद मार-पिट पर भी उतारू हो सकते हैं | पीआर का ऐसा नमूना शायद ही देखने को मिले | बाबाओं का पीआर एक चरणबध्द पीआर का उदहारण है जिससे हम लॉन्गटर्म पीआर और उसके प्रभाव को सीख सकते है, और व्यवसाय के हिसाब से एडिट करके उपयोग में भी ला सकते हैं |



- विन्ध्या सिंह 

स्किल इंडिया और बेरोजगारी

स्किल इंडिया और बेरोजगारी
photo :google
स्किल इंडिया का नारा आज हर जगह सुनने को मिल जाता है | स्किल का विकास हो न हो लेकिन नेताओं की फोटो पेपर में जरुर छप जाती है , शायद उन्हें बस इतने से ही मतलब है | गाँव की भाषा में इसे कोरम पूरा करना कहते हैं , मतलब किसी तरह जल्दी निपटाओ भाई और झूठे आकड़ें प्रस्तुत कर के खुद की पीठ थपथपा लो | हो गया स्किल इंडिया का वादा पूरा |
70 साल हो गए आज़ादी के , बेतहाशा जनसँख्या भी बढ़ ही रही है  , उसी के साथ- साथ  बेरोज़गारी भी दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है | इसमें स्किल इंडिया का नारा तो अँधेरे में एक रोशनी जैसा है | क्योंकी आज किसी भी क्षेत्र में नौकरी खोजने जाईये तो अप्रशिक्षित लोंगों की जगह प्रशिक्षित लोंगों की ज्यादा मांग है | इसलिए स्किल इंडिया, एक अवसर के तौर पर देखा जा सकता है |  खैर , सरकार तो भरसक यह कोशिश कर रही है की स्किल इंडिया के माध्यम से बेरोजगारों को प्रशिक्षण दे कर उन्हें उचित रोजगार मुहैया काराया जाये | इस मिशन से ख़ास तौर पर गरीबों और उन छात्रों को फायदा होगा जो आर्थिक स्थिति की वजह से तकनिकी पढ़ाई नहीं कर पाते और मजबूरन अकुशल कामगार की तरह कार्य करना पड़ता है |

स्किल डेवलपमेंट के मामले में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत बहुत पीछे हैं। चीन में 45 फीसदी, अमेरिका में 56 फीसदी, जर्मनी में 74 फीसदी, जापान में 80 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी लोग किसी न किसी कौशल में प्रशिक्षित हैं, जबकि भारत में यह संख्या 4 फीसदी से भी कम है। पहली बार उन युवाओं के बारे में सोचा जा रहा है जिनकी औपचारिक शिक्षा किन्हीं वजहों से छूट गई थी | अगर स्किल इंडिया का यह विचार सफल होता है तो भारत एक बार फिर सम्पूर्ण विश्व में एक अलग मुकाम बनाने में सफल होगा |

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...