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मंगलवार, 15 जून 2021

#पॉलिटिकल_मानसून : बंगाल की खाड़ी का राजनीतिक मानसून यूपी और बिहार पहुँच गया है !

बिहार में ‘चिराग’ जल रहा है, और यूपी का 'हाथ' कमल पकड़ रहा है, तो हाथी वाले साथी अपनी राजनीतिक रफ़्तार बढ़ाने के लिए साइकिल की सवारी करने के जुगाड़ में हैं।

खेला होबे- खेला होबे करते-करते ममता दीदी बंगाल में सरकार क्या बनायीं, यूपी और बिहार में पार्टी तोड़ने-जोड़ने का कार्यक्रम चलने लगा। बंगाल में टीएमसी छोड़ बेटे संग भाजपा में आये मुकुल रॉय विधानसभा चुनाव के बाद वापस पुराने घर टीएमसी में चले गए। और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता जितिन प्रसाद, जो राहुल गाँधी ब्रिगेड के माने जाते थे और उनके करीबी नेताओं और सिपहसालार में शुमार थे कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी का दामन थाम लिये। तो वहीं बिहार की एक क्षेत्रीय और पारिवारिक पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी, जो राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए अपनी साख ही दांव पर लगा बैठी थी, में ऐसी फूट पड़ी की भतीजे की अध्यक्षता वाली पार्टी को चाचा ने ही तोड़ दिया। मामला इमोशन और महत्वाकांक्षा का था तो राजनीतिक चुहलबाजी तो होनी ही थी। वैसे भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में कहीं कोई हलचल होती है, तो उसकी आवाज़ दिल्ली तक सुनाई देती है। इस पार्टी के संस्थापक दिवंगत नेता रामविलास पासवान थे जिन्हें 'मौसम विज्ञानी' कहा जाता था। राजनीतिक परिस्थिति भांपते हुए वह किसी भी पार्टी में सट के कम से कम मंत्री तो बन ही जाते थे। यह गुण शायद बेटे में नहीं आया और वह सीधे-सीधे राजनीतिक पुरोधाओं को चुनौती देने लगे, तो फिर उसका खामियाज़ा भी तो भुगतना पड़ेगा। इसलिए अभी मामला लाइमलाइट में चल रहा ह
ऐसी ही एक घटना कुछ वर्ष पहले उत्तर-प्रदेश में भी हुयी थी पर यहाँ भतीजा 'जबर' मना गया, और उसने चाचा को ही पार्टी से दूर करने का प्रबंध कर दिया। लेकिन बिहार में चाचा चंठई कर दिए और चिराग पासवान की पार्टी ही उनके नीचे से दरक गयी।
अभी उत्तर-प्रदेश में एक और मामला देखने-सुनने को मिल रहा है जिसमें मायावती की पार्टी-बसपा के कुछ विधायक एक गुट बना कर अपनी पार्टी से अलग होने की फ़िराक में हैं, और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के संपर्क में हैं। मतलब समझ ही सकते हैं जो राजनीतिक मानसून बंगाल की खाड़ी से उठा वह पूर्वी विक्षोभ के सहारे उत्तर-प्रदेश तक पहुँच गया है। इस पार्टीतोड़वा टाइप काम से कोई दल फूला नहीं समा रहा होगा।
पश्चिमी विक्षोभ भी हिलोरे मार रहा है और अरब सागर की ओर से जल्द ही राजनीतिक मानसून उठने की सुगबुगाहट हो रही है। खबरें उड़ रही हैं, देखिये आगे कितनी सत्य होती हैं। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, शरद पवार से मिलकर क्षेत्रीय दलों के माध्यम से केंद्र सरकार के खिलाफ एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करने की जुगत में हैं जिसमें ममता बनर्जी एक सशक्त नेता के रूप में अगुआई कर सकती हैं। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद वह एक आयरन लेडी के रूप में उभरी हैं, शायद इसलिए उन्हें मोदी के सामने एक मजबूत नेता के तौर पर देखा जा रहा है। ( उनके अलावा कहीं कोई दिख भी तो नहीं रहा है)
पश्चिमी विक्षोभ जब आगे बढ़ेगा तो राजस्थान और पंजाब में भी गरज-चमक के साथ थोड़ी बहुत आंधी-तूफ़ान आने की संभावना है। गहलोत सरकार से नाखुश और कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट भी कभी-कभी विरोध के सुर अलाप देते हैं। उनके सुर-ताल को देखते हुए, दिल्ली में समझाईस कार्यक्रम भी जोर पकड़ लेता है। पर देखना है की कब तक यह चक्र चलता है।

पंजाब में सिद्धू की एक अपनी अलग नुरा-कुश्ती चल रही है। जिसमें वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ नगाड़ा बजा रहे हैं। आपको तो ज्ञात ही होगा की वह बीजेपी से रूठ कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन उनके अनुसार वहां उनको हल्के में लिया जाने लगा है। अपना वजन बताने के लिए वह राजनीतिक कुश्ती के दांव आजमा सकते हैं।
कुल मिला-जुला के यही खेला है, की राजनीति में कोई किसी का नहीं होता भले बचपन में एक ही थाली में खाए हों या एक-दुसरे के कपड़े पहन कर जय-वीरू बनें हों। पॉवर, पद और महत्वाकांक्षा की लड़ाई में सब कुछ जायज ही ठहराया जाता है। राजनीति का मानसून कब कहाँ से चलेगा किसी को नहीं पता होता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे खूब तेज धूप में बारिश होने लगे, और आप टोटल कन्फ्यूजिया जाते हैं।
- विन्ध्या सिंह ( vindhya08@gmail.com) Twitter: vindhya08
(वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और बदलते मानसून को देखते हुए)

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

अपने पड़ोसियों को नज़रंदाज करता भारत



Image Source: Google


चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, भूटान, नेपाल देश भारत के पड़ोसी देश हैं और बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे हैं की पड़ोसियों से रिश्ते मधुर रखना चाहिए, क्योंकि दूर के रिश्तेदार बाद में आते हैं लेकिन पड़ोसी तुरंत मौके पर उपस्थित रहते हैं |
पर शायद अब भारत यह भूल गया है और उसे पड़ोसियों की कोई फ़िक्र नहीं | बस, अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भर रहा है जो खतरे की घंटी है | भारत भले ही चीन के साथ अपने संबंधों को सहज देख रहा हो , पर चीन इसे अलग नजरिये से देखता है इसे आप सीमा पर हुए गतिरोध से समझ सकते हैं | चीन हमेशा से प्रसारवादी नीति का समर्थक रहा है , यहाँ तक की भारत के साथ अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर क्षेत्र के हिस्सों को लेकर अपना दावा करता रहा है और वह इसके प्रति सतर्क भी है | हाल के दो वर्षों की घटनाओं से आप यह समझ सकते हैं | हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी मुसीबत में पड़ने के बाद ही आया जो इतने सालों बाद भी बस एक जुमला बन के रह गया है |

भारत के यह पड़ोसी अब पराये बन रहे हैं , ताज़ा मामला मालदीव का ही देखें तो, दो टूक समान अधिकार शब्दों के माध्यम से चीन ने भारत को इस मामले से दूर ही कर दिया जबकि भारत ने मालदीव के तख्तापलट के संकट में भरपूर साथ दिया था | अब वहाँ के विपक्ष में भारत के प्रति नकारात्मकता पनपने लगी है | बगल में श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लगभग चीन को ही सौंप चुका है और भारी निवेश भी कर रहा है | वहीं चीन ने म्यांमार के साथ 24 अरब डॉलर का वित्तीय समझौता किया है तथा वहां एक बंदरगाह का निर्माण भी कर रहा है | नेपाल की मार्क्सवादी ओली सरकार का झुकाव चीन की तरफ है और चीन भारी मात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है , सिर्फ यही नहीं चीन से नेपाल के लिए ट्रेन की लाइन बिछाने पर भी काम चल रहा है इस तरह चीन की पहुँच नेपाल के रास्ते भारत के सीमा तक होगी | भूटान, एक ऐसा देश है जो भारत का साथ दे रहा है लेकिन चीन के लगातार दबाव को वह सहन करता है और वह दिन दूर नहीं जब भूटान भारत के पाले से निकल कर चीन की ओर खड़ा होगा | बांग्लादेश में अभी सबसे बड़ा निवेशक चीन ही है , भले इस देश की सीमायें भारत से जुड़ी हैं लेकिन वहां का राजनीतिक समीकरण भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है | रही बात पाकिस्तान की तो अब यह बात धीरे-धीरे पूरा विश्व समुदाय जानने लगा है की पाकिस्तान अब पूरी तरह चीन के साथ है जहाँ चीन यहाँ अनेक स्तर पर निवेश कर रहा है वहीँ ग्वादर बंदरगाह को बनाकर हिन्द महासागर तक अपनी पहुँच बनाते हुए स्पेशल आर्थिक जोन बनाते हुए पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते सुगम यातायात व्यवस्था के लिए सड़क निर्माण भी कर रहा है | भारत ने इसपर अपनी आपत्ति भी जताई है लेकिन यह बहुत कारगर नहीं रही है |

पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादियों के पनाह के देश के रूप में घोषित कराने में भारत को भले सफलता मिली हो लेकिन चीन उसके विकास में भरपूर सहयोग दे रहा है | यदि पाकिस्तान के साथ भारत का किसी भी तरह का युद्ध होता है तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना होगा | चीन अपने बड़े रणनीति के अनुसार भारत के सीमा पर अतिक्रमण कर उकसा रहा है और इधर पाकिस्तान घुसपैठ करा कर भारत के नाक में दम कर रखा है | भारत अपने विदेश नीति में पिछड़ता जा रहा है और चीन को एक तरह से वाक ओवर देता जा रहा है | चीन विश्व मंच पर भी भारत की खिलाफत करता रहा है चाहे वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देश की सदस्यता हासिल करना हो |


साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में ज्यादा से ज्यादा निवेश करके भारत को चारो ओर से घेरता जा रहा है और भारत अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भरता जा रहा है | चीन खुद को एशिया के एकमात्र  महाशक्ति के रूप में देखता है और उसी अनुरूप आचरण भी कर रहा है , वह कभी नहीं चाहेगा की भारत उसके समकक्ष खड़ा हो सके | उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को समर्थन देकर वह अमेरिका जैसे देश को आँख दिखाकर यह बताना चाहता है की वह उसके बराबर है | भारत का पड़ोसियों को अनदेखी करना अमेरिकी दोस्ती पर भारी पड़ेगी | भारत को अब भी सचेत होने की जरुरत है , अपने पड़ोसियों को समझने की जरुरत है अन्यथा चीन, भारत को एक ड्रैगन की तरह निगल जायेगा |  

(यह हमारे निजी विचार हैं , विदेश नीति एक बहुत बड़ा कांसेप्ट है और मैं उसके आस-पास भी नहीं फटकता , लेकिन विभिन्न समाचारों एवं लेखों इत्यादि के माध्यम से इस विषय में लिखने का विचार आया तो लिख दिया | यदि आप किसी बात से असहमत हो तो आप कमेंट में जरुर लिखें , यह जरुरी नहीं की मैं इस मुद्दे पर ज्यादा जनता हूँ आप कुछ भी अच्छा लिखेंगे तो यह मेरे लिखने में और सुधार ही करेगा |)


बुधवार, 3 मई 2017

नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों का भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए

सुप्रीमकोर्ट द्वारा सराहनीय पहल ! शिक्षामित्रों को किया जा सकता है बर्खास्त | अखिलेश सरकार ने वोट की राजनीति में नौनिहालों के जीवन से जो खिलवाड़ शुरू किया था , अब वक़्त आ गया है की यह सब बंद हो | पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षकों की जगह शिक्षामित्रों को रखकर पुरे बेसिक शिक्षा के साथ मजाक किये अखिलेश सरकार | अब यूपीटेट २०११ के सभी उत्तीर्ण लोंगों को पूर्ण समायोजन किया जाना चाहिए | शिक्षामित्रों से कोई विरोध नहीं है लेकिन जो गलत है वह गलत है उनकी नियुक्ति ही अवैध और असंवैधानिक तरीके से हुयी |

साथ ही प्राईमरी स्कूल के बच्चों के ड्रेस के बारे में भी बात करना चाहता हूँ | आप देखते होंगे की छोटे प्यारे बच्चे स्कूल ड्रेस में खाकी रंग का पेंट और शर्ट दोनों ही पहने हुए होते हैं ऐसे लगता है की सब मजदूर बनने या पुलिस बनना चाहते है | आखिर अखिलेश सरकार ऐसा ड्रेस कोड बना के क्या सन्देश देना चाहती थी ??? की सब बच्चे नॉन स्किल लेबर और पुलिस होमगार्ड बनने से ज्यादा ना सोच पाएं ??? उनके सोच को बस वहीँ तक समेट दें की वह आगे की सोचे ही ना और हम उत्तर प्रदेश में राज करते रहें | जरा सोचिये इन सब चीजों का एक बच्चे के ऊपर क्या असर पड़ता है तब समझेंगे ... इस तरह का ड्रेस बदलना चहिये | उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को सुधार कर ही प्रदेश को उदीयमान बनाया जा सकता है , तभी असली विकास होगा | नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों की जिंदगी और भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए |

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

खाट का मजाक और देहात

खाट का मजाक और देहात

अभी कुछ दिन पहले राहुल गाँधी जी ने देवरिया , उत्तर प्रदेश से दिल्ली तक यात्रा शुरू की और साथ ही खाट सभा का आयोजन कर रहे है जो लगातार चल रहा है | पहली खाट सभा का आयोजन देवरियां में ही हुआ , जहाँ हजारों की संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे और खाट सभा में भाग लिए | नेता जी के जाने के बाद लोंगों ने वहाँ पड़ी हुई खाट अपने अपने घर उठा के ले जाने लगे | जिसको सभी टीवी चैनलों और मिडिया के अन्य माध्यमों ने बहुत ज्यादा कवरेज दिया , शायद उतना राहुल गाँधी के भाषण को न मिला हो |
पुरे दिन ट्वीटर ट्रेंड रहा #खाटसभा #खाट इत्यादि | फेसबुक पर तरह तरह के भद्दे मजाक भी बने | पर शायद खुद को पढ़ा लिखा और तकनिकी ज्ञानी मानकर लोग यह भूल गए की एक आम ग्रामीण इंसान के लिए खाट की क्या इज्जत है और उसके जीवन में कितना महत्व है |
एक शहरी इंसान जिसके पास सारी सुख सुविधाएं है वह घर बैठे ऐसे ही मजाक बना सकता है क्योंकी उसको पता ही नहीं की उसके  जीवन स्तर से निम्न जीवन स्तर जी रहे उन ग्रामीणों के लिए वह एक खाट उनके आराम से सोने के लिए एक आधार है तो एक मरीज़ को ले जाने के लिए एम्बुलेंस | आज भी जा कर देखिये दूर दराज के गाँवों को जहाँ ढंग की सड़के तक नहीं , बस गाड़ी की तो बात ही बहुत दूर की है | ढंग के स्कूल नहीं अगर हैं भी तो 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं , जहाँ लोग अपने बच्चों को प्राइमरी के बाद की शिक्षा के लिए भेजते हैं | शहर जाने के लिए 2-2 पैसे जोड़ने पड़ते हैं |
पर हम लोग तो मजाक ही उड़ायेंगे क्योंकी हमारी शहरी मानसिकता के अनुसार सभी ग्रामीण तो पिछड़े हैं | खाट तक नहीं छोड़ते , ले के भाग जाते हैं .... अब आप ही बताइए की जब सभा ख़त्म हो गयी और उस खाट का कोई उपयोग नहीं है तो लोग क्या करें ????
एक खाट उनके लिए , उस शहरी बेड से कहीं ज्यादा है तो फिर क्यों न ले जायें ???
हर बात पर मजाक आसानी से किया जा सकता है लेकिन सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं हो सकती |

दूसरों पर हँसना ज्यादा आसान होता है .....

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

विपरीत बोल , नाम का शोर

विपरीत बोल , नाम का शोर

अभी हाल में ही शोभा डे के बयान से आप सभी वाकिफ़ होंगें | पर शायद वह ओलंपिक के दबाव और खेल भावना से वाकिफ़ नहीं हैं, तभी तो खिलाड़ियों के मनोबल बढ़ाने के बजाय , उनका मनोबल तोड़ने वाला बयां देकर सुर्खियाँ बटोरने में लगी हैं |
विपरीत बोल ,नाम का शोर ... पब्लिसिटी का एक टूल है जिसे कथाकथित सेलिब्रेटी जब चाहे तब कुछ भी उल्टा बोल के अपने नाम को ट्विटर टैग में टॉप पर रहने के लिए उपयोग कर सकते हैं | ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते की इसका असर खिलाड़ियों के दिमाग पर क्या पड़ेगा | शोभा डे , या इन जैसे लोग जो समय- समय पर विपरीत बात बोल कर अपने आप को बहुत बड़ा बुद्धजीवी प्रूव करते है , 100 मीटर दौड़ने में नानी –दादी याद आ जाएँगी | ऐसे लोग खुद से निम्बू पानी बना के भी नहीं पी सकते , थकान हो जाती है, और खिलाडियों को , जो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उनको यह बोल रही की – वो पैसे, समय की बर्बादी करने और सेल्फी लेने रियो गए हैं |
शोभा डे , अगर आप भी पुरे देश का प्रतिनिधित्व करती और आपके किसी जीत या कार्य से देश का झंडा ऊँचा होता तो आपको भी फक्र होता | किसी देश का खिलाड़ी जीतता है और जब उसके देश का झंडा ऊँचा उठता है तब उस खिलाड़ी की आंखे ख़ुशी से नम हो जाती हैं | पर आपको पब्लिसिटी पसंद है ,चाहे वह जैसे मिले, जिस स्तर पर गिर कर मिले |
एक खिलाड़ी गुमनामी के अँधेरे में मेनहत करता है , उसके मेनहत को कोई नहीं देखता लेकिन वही खिलाड़ी अपने मेनहत के बल पर ओलंपिक में भाग लेता है और जीतता है तब हम जानने लगते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं | हारने पर हम उसकी मेनहत पर शक करते है, लेकिन यह भूल जाते है की जिस खेल में हमारे देश का खिलाड़ी भाग ले रहा है उसमें विश्व के अनेक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं | और उस खेल में जीतने के लिए सभी खिलाड़ी अपना 100 प्रतिशत देते हैं , परन्तु हर खेल में दो ही चीज़ होती है – या तो जीत या फिर हार | पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं की उस खिलाड़ी ने अपना 100 प्रतिशत नहीं दिया | हर खिलाडी जब वह अपने देश के लिए खेलता है तब वह जीत कर अपने देश के झंडे को ऊँचा करना चाहता है , अपने देश के लोंगों को गर्व करने का एक मौका देना चाहता है , वह चाहता है की दुनिया के लोग उसके देश को जाने |
पर कथाकथित बुद्धजीवियों को सिर्फ अपने आपको मीडिया में हाईलाइट करने से आगे जंहा दिखता ही नहीं |
काश! कभी देश के खेल की तैयारियों के बारे में सोचते की क्रिकेट को छोड़कर बाकि किस खेल के लिए लोग कितना सोचते हैं ? कितने लोंगों को ओलंपिक में गए 5 खिलाडियों का नाम याद होगा ? या कितने तरह के खेल होते है ?
मीडिया फोबिया और बेतुकी बातों को छोड़ , कभी अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश कीजिये , कुछ मेडल तो आ ही जायेंगे |
-         विन्ध्या सिंह 

शनिवार, 27 अगस्त 2016

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

photo: google
वर्तमान समय में विभिन्न सोशल साइट्स और इन्टरनेट ने पुरे विश्व को ग्लोबल विलेज बना दिया है | अमेरिका या तुर्की में कोई घटना घटती है तो, चंद सेकंड में पुरे विश्व के लोग जान जाते है | इसके उपयोग से आभासी दुनियां में लोंगों के बीच बहुत अधिक जुड़ाव हुआ है , वास्तविक दुनियां में कितना है यह एक वक्तव्य से साफ़ है  “एक आदमी के फेसबुक पर 3000 मित्र थे, ट्विटर पर 850 लोग जुड़े थे , लेकिन जब उसकी तबियत ख़राब हुई तब उसके पास और साथ सिर्फ उसकी माँ ,पिता जी और पत्नी ही थे |
खैर यह व्यक्तिगत बात है , परन्तु मिस्र का आन्दोलन और भारत में हर चिंगारी का पुरे देश में फ़ैल जाना सोशल साइट्स के ही उदहारण है, जो व्यक्तिगत से व्यापक हैं |
हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं , राजनितिक औजार के रूप में सोशल साइट्स का उपयोग |
पिछले एक वर्ष में भारतीय राजनीति के अखाड़े में देश के नेताओं के लिए सोशल साइट्स बेहद तेज़ और अचूक औजार साबित हुआ है | हालांकि, इसकी शुरुआत 3 साल पूर्व भ्रष्टाचार के विरोध में उपजे अन्ना जी के आंदोलन से हुई थी | जिसमें चंद सेकंड में अनगिनत लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने में भरपूर उपयोग हुआ | इससे प्रभावित होकर राजनितिक गलियारे में भी विभिन्न सोशल साइट्स जैसे फेसबुक और ट्वीटर इत्यादि को अपनाना पड़ा |
जी हाँ , अगर हम भारतीय सन्दर्भ में देखें तो इसका प्रयोग वर्तमान सरकार में बहुत बड़े रूप में किया गया | एक व्यक्ति को ऐसा दिखाया गया की वही हर्क्युलिश है, और वास्तव में लोंगों ने मान भी लिया | इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे सत्ता विरोधी लहर , पिछली सरकार की नाकामी इत्यादि | परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की मीडिया के साथ सोशल मीडिया (सोशल साइट्स) का हाथ नहीं था, एक ऐसी लहर बनाने में जिससे प्रचंड बहुमत मिल गया और सरकार भी बन गयी |
आज सोशल साइट्स का इतना उपयोग है की, मुख्य मीडिया (टीवी, प्रिंट, रेडियो) भी पीछे हैं | किसी को हीरो बनाना हो या जीरो , बस सोशल साइट्स पर पेज बनाईये और जुट जाइये उसे टैग करने, फ़ैलाने में | सौ बार झूठ पढ़ने के बाद इंसान सच ही मानेगा | (ऐसी कहावत है- सौ बार झूठ बोलने पर, लोग सच ही मानने लगते हैं)

-    विन्ध्या सिंह 

सोमवार, 26 जुलाई 2010

Theater Education

Theater Education is must in the primary and upper primary school. because if we provide theater education in the school then a student think a lot and he will feel independent. his burden of school work or any other work will be secondary things if he will enroll in any dramatically story....and they will feel relax and peace in their mind.....and also their mind fulfill more creativity and social thoughts.............and it's good for our country....


Vindhya'Gorakhpuri'

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...