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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

खाट का मजाक और देहात

खाट का मजाक और देहात

अभी कुछ दिन पहले राहुल गाँधी जी ने देवरिया , उत्तर प्रदेश से दिल्ली तक यात्रा शुरू की और साथ ही खाट सभा का आयोजन कर रहे है जो लगातार चल रहा है | पहली खाट सभा का आयोजन देवरियां में ही हुआ , जहाँ हजारों की संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे और खाट सभा में भाग लिए | नेता जी के जाने के बाद लोंगों ने वहाँ पड़ी हुई खाट अपने अपने घर उठा के ले जाने लगे | जिसको सभी टीवी चैनलों और मिडिया के अन्य माध्यमों ने बहुत ज्यादा कवरेज दिया , शायद उतना राहुल गाँधी के भाषण को न मिला हो |
पुरे दिन ट्वीटर ट्रेंड रहा #खाटसभा #खाट इत्यादि | फेसबुक पर तरह तरह के भद्दे मजाक भी बने | पर शायद खुद को पढ़ा लिखा और तकनिकी ज्ञानी मानकर लोग यह भूल गए की एक आम ग्रामीण इंसान के लिए खाट की क्या इज्जत है और उसके जीवन में कितना महत्व है |
एक शहरी इंसान जिसके पास सारी सुख सुविधाएं है वह घर बैठे ऐसे ही मजाक बना सकता है क्योंकी उसको पता ही नहीं की उसके  जीवन स्तर से निम्न जीवन स्तर जी रहे उन ग्रामीणों के लिए वह एक खाट उनके आराम से सोने के लिए एक आधार है तो एक मरीज़ को ले जाने के लिए एम्बुलेंस | आज भी जा कर देखिये दूर दराज के गाँवों को जहाँ ढंग की सड़के तक नहीं , बस गाड़ी की तो बात ही बहुत दूर की है | ढंग के स्कूल नहीं अगर हैं भी तो 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं , जहाँ लोग अपने बच्चों को प्राइमरी के बाद की शिक्षा के लिए भेजते हैं | शहर जाने के लिए 2-2 पैसे जोड़ने पड़ते हैं |
पर हम लोग तो मजाक ही उड़ायेंगे क्योंकी हमारी शहरी मानसिकता के अनुसार सभी ग्रामीण तो पिछड़े हैं | खाट तक नहीं छोड़ते , ले के भाग जाते हैं .... अब आप ही बताइए की जब सभा ख़त्म हो गयी और उस खाट का कोई उपयोग नहीं है तो लोग क्या करें ????
एक खाट उनके लिए , उस शहरी बेड से कहीं ज्यादा है तो फिर क्यों न ले जायें ???
हर बात पर मजाक आसानी से किया जा सकता है लेकिन सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं हो सकती |

दूसरों पर हँसना ज्यादा आसान होता है .....

सोमवार, 29 अगस्त 2016

पृथ्वी में कई पृथ्वी

पृथ्वी में कई पृथ्वी


Photo:Google
इंसान के विकास के इतिहास की कहानी तो आप सभी लोग जानते ही है, तो आप सभी ये भी जानते होंगे की इन्सान एक ऐसी प्रजाति है जो “जिसमें है उसको छोड़ भविष्य में खुशियाँ खोजता है” | ब्रह्मा के रचनात्मकता का अंत है मानव, और मानव उसी रचना को अपने तरीके से रच के ब्रह्म बनने की कोशिश में लगा हुआ है | आप सब सोच रहे होंगे की मै रचना, ब्रह्मा , मानव इन सबको एक साथ क्यों जोड़ रहा हूँ तो मै आपको इस माध्यम से आपके आस पास ही ले चलता हूँ ..
एक पृथ्वी , जिसमें कई तरह मौसम हैं, कई तरह के जीव जंतु , पेड़ पौधे है , बारिश है हरियाली है , लोग है , रिश्ते है , भावनात्मकता है, खुशियाँ है , सब कुछ है जो एक इन्सान की जरुरत है परन्तु इन्सान की जरूरतें पूरी कब होती है ? यह ऐसा प्रश्न है जो यक्ष, युधिष्ठिर से पूछना भूल गया था शायद |
आज जिस तरह मनुष्यों ने संयुक्त परिवार को छोड़ कर न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) की अवधारणा विकसित कर लिया है वैसे ही न्यूक्लियर पृथ्वी का भी सफल प्रयोग करने लगा है| हो सकता हो की अलग अलग दिमाग के लोंगो के लिए अलग अलग फायदे नज़र आये पर एक पृथ्वी में कई पृथ्वी बनाए जाने पर सबका दिमाग देर सवेर एक ही बात सोचेगा की क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं ?
गर्मी बढ़ रही है , क्यों बढ़ रही है ? क्या आपने कभी अपने स्वार्थ अपने भौतिक सुख से परे हट के दो मिनट के लिए सोचा है ? सोचिये ... !
श्रीमान ! यह हम सभी मानव की वजह से ही बढ़ रही है | ये जो मौसम की मार झेल रहे है न यह बस हम मानव के बेहतरीन सुख पाने के चक्कर में ही झेल रहे है | एक पृथ्वी जो सब कुछ देती है हवा, पानी, भोजन , इत्यादि | सबको बराबर देती है क्योकि सबका बराबर हक भी है,  परन्तु मानव स्वभाव है की सब कुछ मेरे पास हो, इसके चक्कर में जिनके पास नहीं है वो उनके स्वार्थ की मार झेल रहे है | आज कुछ लोगों के घर में एसी है , उनके कार में, ऑफिस में हर जगह | अपनी एक छोटी सी पृथ्वी लिए हर जगह घूम रहे है , जी रहे है | उनको तो अच्छा लग रहा है पर उससे निकलने वाली गर्मी से कौन परेसान है ? मानव ही न |मानव ही मानव का दुश्मन बना हुआ है | एक ऐसा युद्ध जिसमें कोई हथियार नहीं है बस अपना-अपना स्वार्थ है और वही कालचक्र बन गया है |
लातूर से लेकर बुंदेलखंड तक पानी नहीं है , गर्मी में और भी जगह के नल सूखते ही जा रहे , रोज़ वायु प्रदुषण का रोना रोयेंगे परन्तु वो सब कुछ करेंगे जो आज की समस्या का कारण है | प्रदुषण के कारण मौसम भी बदमिजाज़ हो ही गया है और यह बदमिज़ाजी सिर्फ बढती ही जा रही है | आप अभी उतराखंड के दावानल को देखिये और तो और बढ़ते हुए कश्मीर तक पहुच गया |
जो पृथ्वी देती रही है वो हर मौसम अब मानव को एकल रूप में चाहिए | अपनी दुनिया अपनी पृथ्वी जहाँ हर मौसम का आभास मात्र हो , अपनी छोटी सी पृथ्वी | भले प्राणवायु (ऑक्सीजन) खरीदना पड़े , पानी तो बिक ही रहा है | डार्विन के जीवन का सिध्दांत ( वही जिराफ़ वाली ) – ‘जिसकी पहुँच उसकी जिंदगी’ | खुद ही आसान सी जिंदगी को एक रेस में बदल दिए है हम सब |
लोग अपने आप में ही मशगुल हो गए है और सिमटते जा रहें है, अपने बनाये छोटे छोटे पृथ्वी में, पर कोई इस एक पृथ्वी के लिए नहीं सोच रहा है| अगर यही नहीं रहेगी तो मानव जो रचनाकार बना खुद में मंत्रमुग्ध है , खुद ही विलुप्त हो जायेगा |
हे मानव ! बचा सकते हो तो अपने स्वार्थ को छोड़ कर इस धरा को बचा लो |


-    विन्ध्या सिंह 


पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...