सोमवार, 26 सितंबर 2016

आधुनिक समय में संवेदना


आधुनिक समय में संवेदना

वो पेपर का टुकड़ा जो मेरे हाथ लगा ....



गाँव शहर , भीड़ , नौकरी, पैसा, जरुरत और भी न जाने क्या क्या .... इंसान भाग रहा है , कहाँ उसको भी नहीं पता | शायद उसकी अपनी जरूरतें या फिर इच्छायें | कभी कभी अकेले बैठ के सोचता और देखता हूँ तो ऐसा लगता है सारी दुनिया एक दौड़ में हैं समय नहीं किसी के पास दूसरों को देखने का , शायद अपनों को भी |
अचानक एक पेपर का टुकड़ा हाथ लगा , और सोच के आश्चर्य हुआ की क्या मानव संवेदना अभी बची है ????
उस पेपर के एक न्यूज को पढ़कर तो कुछ ऐसा ही लगा जैसे समुन्द्र के बीच कोई लकड़ी का टुकड़ा मिला हो और एक उम्मीद बनी हो |
उरी आतंकी हमले में 18 जवान शहीद हुए | भारत के लोंगों की भावनाएं और दुआएं वातावरण में फ़ैल गयी | सोशल मीडिया में श्रधांजली तो चौक चौराहों पर मोमबतियां लिए नागरिक दुःख व्यक्त कर रहे थे | उसी सामाचार को कहीं बैठ के देख रहे थे सर्वेश तिवारी जिसमें गया, बिहार के शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की बेटियां यह जानते हुए की उनके पिता शहीद हो गए और उनका शव घर आ रहा है बावजूद उसके वह लड़कियां अपने स्कूल का पेपर देने गयी | एक रिपोर्टर ने जब पुछा की आप पेपर देने जा रहीं हैं तो बेटियों ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया – मेरे पापा हमें पढ़ाना चाहते थे और हम पेपर नहीं देंगें तो वो नाराज़ हो जायेंगे |
सर्वेश तिवारी यह बात सुन के और उन बेटियों को टीवी पर देखकर रो दिए और सोच लिए की उनको क्या करना है | गया के जिलाधिकारी से संपर्क कर 22 सितम्बर  को  शहीद के घर जाकर उनके परिवार और पत्नी बच्चों से मिले और 20 लाख रूपये का चेक दिया और तीनों बेटियों और एक बेटे के शिक्षा की जिम्मेवारी ली | एक ऐसी संवेदना का परिचय दिया की वह पेपर का टुकड़ा मैं अपने कमरे के दीवार पर लगा दिया | शायद इसलिए की खुद को ये बता सकूँ की मानवता , संवेदना अब भी जिन्दा हैं | भले कुछ ही लोंगों में पर उसी से समाज अपने रास्ते पर चल रहा है | और यह देश इतनी विविधताओं के बाद भी एकता की सूत्र में बंधा हुआ है | यहाँ कितने वाद और पंथ हैं , जातियां और धर्म हैं , भाषा और बोली है फिर भी संवेदना एक है | भारत एक है यहाँ के लोग एक है | भारतीय सेना सीमाओं की सुरक्षा करती है और समाज के ऐसे प्रहरी जो मानवता की सेवा करते हैं | ऐसे देशभक्तों को सलाम करने का दिल चाहता है , गुणगान करने का दिल चाहता है |

ऐ इंसानों सुन लो ,
जब तक संवेदना है ,तुम जिन्दा हो |
मशीन महसूस नहीं कर सकते
जब तक भावनाएं हैं , तुम जिन्दा हो ||


-         विन्ध्या सिंह  

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