शनिवार, 27 अगस्त 2016

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

photo: google
वर्तमान समय में विभिन्न सोशल साइट्स और इन्टरनेट ने पुरे विश्व को ग्लोबल विलेज बना दिया है | अमेरिका या तुर्की में कोई घटना घटती है तो, चंद सेकंड में पुरे विश्व के लोग जान जाते है | इसके उपयोग से आभासी दुनियां में लोंगों के बीच बहुत अधिक जुड़ाव हुआ है , वास्तविक दुनियां में कितना है यह एक वक्तव्य से साफ़ है  “एक आदमी के फेसबुक पर 3000 मित्र थे, ट्विटर पर 850 लोग जुड़े थे , लेकिन जब उसकी तबियत ख़राब हुई तब उसके पास और साथ सिर्फ उसकी माँ ,पिता जी और पत्नी ही थे |
खैर यह व्यक्तिगत बात है , परन्तु मिस्र का आन्दोलन और भारत में हर चिंगारी का पुरे देश में फ़ैल जाना सोशल साइट्स के ही उदहारण है, जो व्यक्तिगत से व्यापक हैं |
हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं , राजनितिक औजार के रूप में सोशल साइट्स का उपयोग |
पिछले एक वर्ष में भारतीय राजनीति के अखाड़े में देश के नेताओं के लिए सोशल साइट्स बेहद तेज़ और अचूक औजार साबित हुआ है | हालांकि, इसकी शुरुआत 3 साल पूर्व भ्रष्टाचार के विरोध में उपजे अन्ना जी के आंदोलन से हुई थी | जिसमें चंद सेकंड में अनगिनत लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने में भरपूर उपयोग हुआ | इससे प्रभावित होकर राजनितिक गलियारे में भी विभिन्न सोशल साइट्स जैसे फेसबुक और ट्वीटर इत्यादि को अपनाना पड़ा |
जी हाँ , अगर हम भारतीय सन्दर्भ में देखें तो इसका प्रयोग वर्तमान सरकार में बहुत बड़े रूप में किया गया | एक व्यक्ति को ऐसा दिखाया गया की वही हर्क्युलिश है, और वास्तव में लोंगों ने मान भी लिया | इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे सत्ता विरोधी लहर , पिछली सरकार की नाकामी इत्यादि | परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की मीडिया के साथ सोशल मीडिया (सोशल साइट्स) का हाथ नहीं था, एक ऐसी लहर बनाने में जिससे प्रचंड बहुमत मिल गया और सरकार भी बन गयी |
आज सोशल साइट्स का इतना उपयोग है की, मुख्य मीडिया (टीवी, प्रिंट, रेडियो) भी पीछे हैं | किसी को हीरो बनाना हो या जीरो , बस सोशल साइट्स पर पेज बनाईये और जुट जाइये उसे टैग करने, फ़ैलाने में | सौ बार झूठ पढ़ने के बाद इंसान सच ही मानेगा | (ऐसी कहावत है- सौ बार झूठ बोलने पर, लोग सच ही मानने लगते हैं)

-    विन्ध्या सिंह 

गाँव और गुडगाँव

गाँव और गुडगाँव
फोटो : google

कहने को तो हम चाँद और मंगल पर पहुँच गए है, पर अभी भी हम मुलभूत समस्याओं से ही घिरे हैं, और आने वाले भविष्य में भी इसका सामाधान नहीं दिखता | देश को आजाद हुए 70 साल हो गए परन्तु अभी मिलेनियम सिटी कहे जाने वाले शहरों में ही ग्रामीण टाइप की समस्यायें विद्यमान है | महंगाई और बिजली का रोना तो रोज़ रोज़ का झंझट है ही | लेकिन साल भर में कुछ ही दिन बारिश होती है, उससे होने वाली परेशानियों से भी आज तक निज़ात नहीं मिल पाई |
गाँव में थे, तो बारिश आने पर यही सोचते थे की काश! शहर जैसी सड़क यहाँ भी होती तो आराम से खेत और चौराहे तक जा पाते | सड़कों पर थोड़ा कचड़ा होता था, क्योकिं सड़कें कच्ची थीं ( अब तो प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से मुख्य सड़कें पक्की हो गयी हैं ) | गाँव में पानी के निकासी की भी कोई समस्या नहीं हैं ( कुछ गाँव में रंजिश के कारण समस्याएं हैं |) , पानी आस-पास के गड्डों में इकठ्ठा हो जाता है | उस टाइम पर, बारिश के समय शहर को सोच-सोच अच्छा लगता था| लेकिन यहाँ गुडगाँव में (जो देश की मिलेनियम सिटी और आईटी सिटी के नाम से जाना जाता है ) थोड़ी सी ही बारिश में जिस तरह हर जगह पानी जमा हो जा रहा , सड़कें टूट जा रहीं और घंटों घंटों जाम लग जा रहा है , इसे देखकर तो यही लगता है की गाँव ही ठीक है क्या अंतर है गाँव और गुडगाँव में |
बेतरतीब तरीके से किया गया डेवलपमेंट, जहाँ ऊँचीं ऊँचीं गगनचुम्बी इमारतें खड़ी हैं , शीशे चमक रहे हैं, वहीँ नीचे सड़कों पर लोग पानी में अपनी-अपनी गाड़ियों और शरीर को लेकर नुरा-कुश्ती खेल रहे हैं | सड़कों पर लोग खड़े होकर यह सोच रहे हैं की पानी के दरिया को कैसे पार करूँ | हालत यह है की घंटो जाम से लोग परेशान हैं |
विकास की अंधी दौड़ में भागने पर, यही सब मूलभूत समस्याएँ दिखती नहीं, पर आगे परेशान बहुत करती हैं | और इसे गुडगाँव के लोग या देश के ऐसे किसी भी शहर के लोग जो बारिश के पानी से तबाह हैं, महसूस कर सकते हैं |
अब भारत में सिर्फ प्राकृतिक बाढ़ ही नहीं इंसानों द्वारा कृत्रिम तरीके से भी बाढ़ लाने की क्षमता है जिसका दोहन वह हर बारिश के मौसम में कर रहा है | मीडिया भी समय आने पर अपने काम की इतिश्री कर लेती है, और सरकारें भी बरसाती मेढक की तरह इलेक्ट्रोनिक चैनलों में टर्र-टर्र करके मौसम की तरह  बदल लेती हैं |
भाई ! चाँद और मंगल पर बाढ़ आये तो समझ लेना इंसान वहां रहने के लिए पहुँच गया है......

-विन्ध्या 

राजनितिक पार्टियों के मीडिया प्रभारी और मीडिया की निष्पक्षता

राजनितिक पार्टियों के मीडिया प्रभारी और मीडिया की निष्पक्षता
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राजनितिक पार्टियों के संगठन में, मीडिया प्रभारी पद से आप सभी अवगत होंगे | इनके कार्य से भी आप अंजान नहीं होंगे , इनका कार्य है मीडिया प्रबंधन | मीडिया के लोंगों को मैनेज करना और उसी अनुरूप अपने पार्टी से जुड़े सामाचार को मैनेज करना |
अब सवाल यह उठता है की क्या मीडिया निष्पक्ष रूप से अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है ? तब जब इसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में परिभाषित किया गया है |
इस प्रश्न के उत्तर को समझा जा सकता है | आज प्रत्येक मीडिया समूह (प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक, वेब ) आर्थिक आधार पर अपने कंटेंट और समाचार का चुनाव करते हैं | इनके आर्थिक समृद्धि का प्रमुख स्रोत विज्ञापन है | अब पहले की पत्रकारिता नहीं रही जब लोग सामाजिक परिवर्तन के लिए समाचार पत्र निकालते थे और सामाचार लिखते थे |
प्रत्येक मीडिया समूह किसी न किसी पार्टी के अपरोक्ष हस्तक्षेप से या फिर उस पार्टी के नेताओं के सहयोग से चल रहा है ( यह जाँच का विषय हो सकता है ) | और जो ऐसे किसी तरीके से जुड़ाव नहीं रखता वह अपने आर्थिक नीतियों के हिसाब से सत्ता के अनुरूप खुद को ढाल लेता है | फिर हम मीडिया की निष्पक्षता को कैसे सही ठहरा सकते हैं ?
जब किसी पार्टी के किसी नेता द्वारा कानून का उलंघन होता है या फिर कोई अपराध या गलतियां होती है तब यह पार्टी के मीडिया प्रभारी डैमेज कण्ट्रोल में लग जाते है और मीडिया समूह को मैनेज करने में जुट जाते है | अक्सर सत्ताधारी पार्टी का दबाव ज्यादा रहता है क्योंकी अपने छवि के साथ -साथ कुर्सी भी बचानी होती है | अपने विचारधारा वाले पत्रकारों को पार्टी देना उनके गलत या सही कार्यों को कराना ,यही इनका मीडिया प्रबंधन हैं | अपने पार्टी के इमेज को बनाने के लिए यह मीडिया का भरपूर उपयोग करते हैं , और मीडिया यह भूल जाती है की क्या सही है और क्या गलत क्योंकी उनके समाचार का आधार आर्थिक है |
वास्तव में मीडिया की यह भूमिका कहीं न कहीं भारतीय जनमानस के विचार को , सामाजिक गतिविधियों और विकास को तवज्जों नहीं दे रहा , अगर दे भी रहा तो वह सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह आता है और फिर गायब भी हो जाता है | मीडिया की भूमिका , विभिन्न राजनितिक पार्टियों के मीडिया प्रभारी तय करने लगे हैं | अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो देगी और लोग अन्य माध्यम के द्वारा अपने विचारों के अभिव्यक्ति में विश्वास करने लगेंगे | मीडिया को पार्टी के मीडिया प्रभारियों के प्रभाव से बचाना होगा अन्यथा लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ डगमगा कर धराशायी हो जायेगा |

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

Media par Ankush aur Kashmir

मीडिया पर अंकुश और कश्मीर
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कश्मीर, एक ज्वलंत मुद्दा है... जो भारत और पाकिस्तान के अविर्भाव के साथ ही 70 साल से जल रहा है | कभी अपने विलय को लेकर तो कभी अपने आज़ादी को लेकर तो कभी विभिन्न आतंकी समूहों द्वारा वहां के युवाओं को बरगलाकर हाथ में बम और बन्दुक थमाने को लेकर | अब पैलेट गन , कर्फ्यू, आतंकी को शहीद बनाकर, पत्थरबाज़ी, बेमतलब फतवा जारी कर कश्मीर लगातार सुर्ख़ियों में है |
मीडिया पर अंकुश, इस ज्वाला को और भड़का रहा हैं | आज इन्टरनेट , टीवी, समाचारपत्र सब बंद है जिससे पूरा कश्मीर पूरी दुनिया से कटा हुआ है | खबर तो छन छन के आ ही जाती है पर मुख्य मीडिया के अंकुश से बहुत सी जमीनी हकीक़त से हम सब अनजान रह जाते हैं |
कश्मीर के जलने के बहुत से कारण हो सकते है लेकिन मीडिया के प्रभाव से यह जगह भी अछूता नहीं रहा है | पढ़े लिखे कश्मीरी युवा वर्ग मुख्य मीडिया के साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचारों को खुले तौर पर रख कर अपने परेशानियों और जरूरतों को रख पाते हैं | जिससे दुनिया के सभी हिस्सों के लोग रूबरू होते हैं | चूँकि, कश्मीर भारत के अखंडता से जुड़ा है इसलिए ऐसा ऐतिहात बरता जा रहा है | लेकिन कहीं न कहीं यह अंकुश अभिव्यक्ति के आज़ादी का हनन है | हमारा तरीका बर्बर और निरंकुश नहीं होना चाहिए | सरकार और उनके प्रतिनिधियों को कश्मीर के मूल समस्या और ज़मीनी हकीक़त को समझकर लोंगों के अन्दर एक विश्वास पैदा करने की जरुरत है, और समस्त अलगाववादी नेताओं को नेस्तनाबूंद करने की जरुरत है ,क्योंकी जब तक अलगावादी नेता रहेंगें तब तक कश्मीर की जनता इसी तरह दोहरे विचारधारा की आग में जलती रहेगी |

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

World Wada-Paaw Day

विश्व वड़ा-पाव दिवस पर 144 फीट लम्बे वड़ा-पाव का साक्षी बना गुडगाँव

गुडगाँव 23 अगस्त , वैसे तो वडा-पाव मुंबई (महाराष्ट्र) के लाइफ फ़ूड के रूप में जाना जाता है लेकिन सबसे लम्बे वडा पाव बनाने के लिए गुडगाँव का नाम दर्ज होने जा रहा है | विश्व वडा पाव दिवस के अवसर पर आज गुडगाँव का ‘नुक्कड़वाला’ रेस्टोरेंट, 144 फीट लम्बा वड़ा –पाव बनाकर लिम्का बुक की दावेदारी पेश किया | 200 किग्रा आलू और 200 किग्रा ब्रेड के साथ 25 लोंगों की टीम ने इसे 3 घंटे में तैयार की, जिसकी अगुआई मुख्य शेफ़ अजय शूद ने किया | नुक्कड़वाला , वाटिका ग्रुप का एक फ़ूड चेन रेस्टोरेंट है | वड़ा-पाव बनाने की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी हुई जिसे लिम्का बुक के पर्यवेक्षक को सौपा गया | परिक्षण के बाद इसे लिम्का बुक में दुनिया का सबसे लम्बा वड़ा- पाव गुडगाँव के नाम दर्ज किया जायेगा | इसके लिए पहले से ही रजिस्ट्रेशन हो गया है | 500 से अधिक लोगों ने सेक्टर -49  स्थित वाटिका बिजनस पार्क में आकर इसे देखा और इसका स्वाद का लुफ़्त उठाया , जो लोंगों के लिए फ्री रहा |

वाटिका ग्रुप के एमडी गौरव भल्ला ने बताया कि- “मैं यह सोचता हूँ की वडा-पाव जैसे स्ट्रीट फ़ूड को हम हल्के में लेते हैं | हम यह चाहते थे की लोग विश्व वडा-पाव दिवस के बारे में जाने, इसलिए यह निर्णय लिया की हम अपने अनूठे ‘नुक्कड़वाला’ तरीके से इसे मनाएंगे |  यही कारण है की हम इस अवसर पर दुनिया का सबसे लम्बा वडा-पाव बनाकर सेलिब्रेट कर रहें हैं |”

सोमवार, 22 अगस्त 2016

Beti Bachao, Beti Padhao , Beti Ko Khiladi Banao

सिन्धु, साक्षी है बेटियों के प्रतिकार का


पूरा देश खुश है ,मदमस्त है .... देश की बेटियों ने तिरंगे का सम्मान बढ़ाया है | देशवासियों को नाज़ करने का एक मौका दिया है | हो  भी क्यों न , 125 करोड़ जनता आज बेटियों की वजह से खुश है |
क्या यह ख़ुशी सिर्फ इसलिए है की ओलम्पिक में भारत को मेडल मिला ??? या इसलिए की यह काम बेटियों ने किया ???
इस प्रश्न का उत्तर शायद न मिल सके क्योंकी हम सच से हमेशा भागने वालों में से है , हाँ यह जरुर है की जिस गुरुर में सामाजिक ताना - बाना चल रहा है , उस पर एक अघात पहुंचा है क्योंकी मेडल सिर्फ लड़कियां ही लायी हैं |
क्या आपको दुःख नहीं होता जब रोज़ सुबह अख़बार उठाते ही बेटियों के साथ हो रही ज्यादती , छेड़छाड़ , बलात्कार ,गैंगरेप की घटनाओं के ख़बरों को पढ़ते हैं ?? कितना नाज़ है बेटियों पर , कितना अभिमान है बेटियों पर ?? सिर्फ इसलिए की देश का सर झुकने से बच गया, ओलम्पिक में मेडल आ गया | लेकिन देश में ही हो रही उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार और पुरुषवादी मानसिकता तथा उपभोग की वस्तु समझकर जिस तरह व्यवहार हो रहा है ,क्या यह देश का सर नहीं झुका रहा ?
एक तरफ ‘बेटी बचाओ,बेटी पढाओ’ का नारा देते हुए हम समाज को मजबूत  और जागरूक कर रहे तो दूसरी तरफ उनको उनके लड़की होने का एहसास भी करा रहे हैं , वह भी पुरुषवादी मानसिकता के साथ |
एक बार उनके होने के एहसास को समझें , सिर्फ एक बार उनके मजबूती को समझे जो किसी भी परिस्थिति को संभाल लेती हैं  तो सिर्फ एक सिन्धु ,साक्षी ,दीपा , बाबर ,साईना, सानिया, फोगाट और  न जाने कितने नाम हैं , को देश का नाम ऊँचा करते हुए देखेंगे |
महिलाएं बहुत मजबूत होती हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी  धैर्य रखती हैं | किसी देश का विकास तभी हो सकता है जब उस देश में महिलाओं का सम्मान हो और उनकी शिक्षा तथा विकास का उचित प्रबंध हो | क्योंकी आगे आने वाली पीढ़ी के निर्माण में एक मां की भूमिका प्रथम शिक्षक के रूप में होती है | महिलाओं ,बेटियों का सम्मान करें और उनको सामान अवसर देने का प्रयास करें |


-          विन्ध्या सिंह 

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...