मंगलवार, 27 सितंबर 2016
क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?
क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?
युद्ध का नाम आते ही
उसकी भयावहता आँखों के सामने तैरने लगती है | फिर भी युद्ध का उन्माद बना हुआ है ,
कहीं वाजिब कारण है तो कहीं बिना किसी कारण के | आज युद्ध का उद्देश्य बदल गया है
| राजाओं और मुग़ल शासकों ने अपने राज्य, सिंहासन और राज्य विस्तार के लिए युद्ध
लड़ा और आज धर्म के विस्तार के लिए युद्ध हो रहें हैं | जहाँ तक सभी धर्म के मूल की
बात करें तो किसी धर्म ने बिना वज़ह युद्ध की इज़ाज़त नहीं दिया लेकिन कुछ विकृत
मानसिकता के धर्मगुरु ( किसी भी धर्म के ) लोंगों को बरगला कर धर्मयुद्ध में ढकेल
रहे हैं |
शांति और मानवता के
पुजारी बस इतिहास के पन्नों और अपने जन्मतिथियों तक सिमट गए हैं | सत्य और अहिंसा
बस कोरी बातें साबित हो रही हैं | कोई जबरदस्ती युद्ध थोप रहा है तो कोई अपने बचाव
में युद्ध कर रहा है | सभी वैश्विक शक्तियां अपने अपने फायदे और बाजारीकरण के
फ़िराक में बस मूक दर्शक बनी देख रहीं हैं |
भारत देश , एक
संप्रभु और गणतंत्र राष्ट्र के रूप में जाना जाता है लेकिन पड़ोसी मुल्क अपनी
हरकतों से बार बार युद्ध के लिए उकसा रहा है | आखिर एक कश्मीर की वजह से कितनी
जानें जाएँगी और कितनी राजनीति होगी ???
कश्मीर भारत का अंग
है यह जानते हुए भी पड़ोसी मुल्क लगातार घुसपैठ करके निर्दोष सैनिकों और नागरिकों
को मार रहा है | और सम्पूर्ण विश्व के सामने अपने कुरूप चेहरे को अपने बातों से
ढकने का प्रयास कर रहा है |
एक कहावत है – “ सौ
सुनार की और एक लोहार की | जो वर्तमान स्थिति में पड़ोसी मुल्क पर सटीक बैठता है |
लेकिन भारत देश शांति का देश है | यह ऐसा देश है जहाँ युद्ध नहीं प्यार की बात पर
जोर दिया जाता है | क्योंकी शक्तिशाली व्यक्ति बहुत उदार होता है तब तक जब तक
अंतिम स्थिति में मामला न पहुँच जाये |
पड़ोसी मुल्क को यह
समझना चाहिए जो वह कभी समझना नहीं चाहेगा कि शांति और अमन से नागरिकों का ख्याल
करके गरीबी और अशिक्षा को दूर कर राष्ट्र के विकास में ध्यान लगाना चाहिए | 70 साल
गुजरने के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया | भारत जैसा देश खुद को संभालते हुए
प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ओर कदम बढ़ा रहा वहीँ पड़ोसी मुल्क उसके विकास में
बाधक बनने पर तुला हुआ है | युद्ध के लिए उकसाना क्या सही है ?? युद्ध क्या देता
है ??? क्या युद्ध ही किसी बात का समाधान है ??? सबको सोचना चाहिए खासकर पड़ोसी
मुल्क के लोंगों को |
सोमवार, 26 सितंबर 2016
आधुनिक समय में संवेदना
आधुनिक समय में संवेदना
वो पेपर का टुकड़ा जो मेरे हाथ लगा ....
गाँव
शहर , भीड़ , नौकरी, पैसा, जरुरत और भी न जाने क्या क्या .... इंसान भाग रहा है ,
कहाँ उसको भी नहीं पता | शायद उसकी अपनी जरूरतें या फिर इच्छायें | कभी कभी अकेले
बैठ के सोचता और देखता हूँ तो ऐसा लगता है सारी दुनिया एक दौड़ में हैं समय नहीं
किसी के पास दूसरों को देखने का , शायद अपनों को भी |
अचानक
एक पेपर का टुकड़ा हाथ लगा , और सोच के आश्चर्य हुआ की क्या मानव संवेदना अभी बची
है ????
उस
पेपर के एक न्यूज को पढ़कर तो कुछ ऐसा ही लगा जैसे समुन्द्र के बीच कोई लकड़ी का
टुकड़ा मिला हो और एक उम्मीद बनी हो |
उरी
आतंकी हमले में 18 जवान शहीद हुए | भारत के लोंगों की भावनाएं और दुआएं वातावरण
में फ़ैल गयी | सोशल मीडिया में श्रधांजली तो चौक चौराहों पर मोमबतियां लिए नागरिक दुःख
व्यक्त कर रहे थे | उसी सामाचार को कहीं बैठ के देख रहे थे सर्वेश तिवारी जिसमें
गया, बिहार के शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की बेटियां यह जानते हुए की उनके पिता
शहीद हो गए और उनका शव घर आ रहा है बावजूद उसके वह लड़कियां अपने स्कूल का पेपर देने
गयी | एक रिपोर्टर ने जब पुछा की आप पेपर देने जा रहीं हैं तो बेटियों ने बहुत
मार्मिक उत्तर दिया – मेरे पापा हमें पढ़ाना चाहते थे और हम पेपर नहीं देंगें तो वो
नाराज़ हो जायेंगे |
सर्वेश
तिवारी यह बात सुन के और उन बेटियों को टीवी पर देखकर रो दिए और सोच लिए की उनको
क्या करना है | गया के जिलाधिकारी से संपर्क कर 22 सितम्बर को
शहीद के घर जाकर उनके परिवार और पत्नी बच्चों से मिले और 20 लाख रूपये का
चेक दिया और तीनों बेटियों और एक बेटे के शिक्षा की जिम्मेवारी ली | एक ऐसी संवेदना का परिचय दिया की वह पेपर का टुकड़ा मैं अपने कमरे के
दीवार पर लगा दिया | शायद इसलिए की खुद को ये बता सकूँ की मानवता , संवेदना अब भी
जिन्दा हैं | भले कुछ ही लोंगों में पर उसी से समाज अपने रास्ते पर चल रहा है | और
यह देश इतनी विविधताओं के बाद भी एकता की सूत्र में बंधा हुआ है | यहाँ कितने वाद
और पंथ हैं , जातियां और धर्म हैं , भाषा और बोली है फिर भी संवेदना एक है | भारत
एक है यहाँ के लोग एक है | भारतीय सेना सीमाओं की सुरक्षा करती है और समाज के ऐसे
प्रहरी जो मानवता की सेवा करते हैं | ऐसे देशभक्तों को सलाम करने का दिल चाहता है
, गुणगान करने का दिल चाहता है |
ऐ
इंसानों सुन लो ,
जब
तक संवेदना है ,तुम जिन्दा हो |
मशीन
महसूस नहीं कर सकते
जब
तक भावनाएं हैं , तुम जिन्दा हो ||
-
विन्ध्या
सिंह
आधुनिक समय में संवेदना
आधुनिक समय में संवेदना
वो पेपर का टुकड़ा जो मेरे हाथ लगा ....
गाँव
शहर , भीड़ , नौकरी, पैसा, जरुरत और भी न जाने क्या क्या .... इंसान भाग रहा है ,
कहाँ उसको भी नहीं पता | शायद उसकी अपनी जरूरतें या फिर इच्छायें | कभी कभी अकेले
बैठ के सोचता और देखता हूँ तो ऐसा लगता है सारी दुनिया एक दौड़ में हैं समय नहीं
किसी के पास दूसरों को देखने का , शायद अपनों को भी |
अचानक
एक पेपर का टुकड़ा हाथ लगा , और सोच के आश्चर्य हुआ की क्या मानव संवेदना अभी बची
है ????
उस
पेपर के एक न्यूज को पढ़कर तो कुछ ऐसा ही लगा जैसे समुन्द्र के बीच कोई लकड़ी का
टुकड़ा मिला हो और एक उम्मीद बनी हो |
उरी
आतंकी हमले में 18 जवान शहीद हुए | भारत के लोंगों की भावनाएं और दुआएं वातावरण
में फ़ैल गयी | सोशल मीडिया में श्रधांजली तो चौक चौराहों पर मोमबतियां लिए नागरिक दुःख
व्यक्त कर रहे थे | उसी सामाचार को कहीं बैठ के देख रहे थे सर्वेश तिवारी जिसमें
गया, बिहार के शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की बेटियां यह जानते हुए की उनके पिता
शहीद हो गए और उनका शव घर आ रहा है बावजूद उसके वह लड़कियां अपने स्कूल का पेपर देने
गयी | एक रिपोर्टर ने जब पुछा की आप पेपर देने जा रहीं हैं तो बेटियों ने बहुत
मार्मिक उत्तर दिया – मेरे पापा हमें पढ़ाना चाहते थे और हम पेपर नहीं देंगें तो वो
नाराज़ हो जायेंगे |
सर्वेश
तिवारी यह बात सुन के और उन बेटियों को टीवी पर देखकर रो दिए और सोच लिए की उनको
क्या करना है | गया के जिलाधिकारी से संपर्क कर 22 सितम्बर को
शहीद के घर जाकर उनके परिवार और पत्नी बच्चों से मिले और 20 लाख रूपये का
चेक दिया और तीनों बेटियों और एक बेटे के शिक्षा की जिम्मेवारी ली | एक ऐसी संवेदना का परिचय दिया की वह पेपर का टुकड़ा मैं अपने कमरे के
दीवार पर लगा दिया | शायद इसलिए की खुद को ये बता सकूँ की मानवता , संवेदना अब भी
जिन्दा हैं | भले कुछ ही लोंगों में पर उसी से समाज अपने रास्ते पर चल रहा है | और
यह देश इतनी विविधताओं के बाद भी एकता की सूत्र में बंधा हुआ है | यहाँ कितने वाद
और पंथ हैं , जातियां और धर्म हैं , भाषा और बोली है फिर भी संवेदना एक है | भारत
एक है यहाँ के लोग एक है | भारतीय सेना सीमाओं की सुरक्षा करती है और समाज के ऐसे
प्रहरी जो मानवता की सेवा करते हैं | ऐसे देशभक्तों को सलाम करने का दिल चाहता है
, गुणगान करने का दिल चाहता है |
ऐ
इंसानों सुन लो ,
जब
तक संवेदना है ,तुम जिन्दा हो |
मशीन
महसूस नहीं कर सकते
जब
तक भावनाएं हैं , तुम जिन्दा हो ||
-
विन्ध्या
सिंह
शुक्रवार, 16 सितंबर 2016
खाट का मजाक और देहात
खाट
का मजाक और देहात
अभी कुछ दिन पहले राहुल गाँधी जी ने देवरिया ,
उत्तर प्रदेश से दिल्ली तक यात्रा शुरू की और साथ ही खाट सभा का आयोजन कर रहे है
जो लगातार चल रहा है | पहली खाट सभा का आयोजन देवरियां में ही हुआ , जहाँ हजारों
की संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे और खाट सभा में भाग लिए | नेता जी के जाने के
बाद लोंगों ने वहाँ पड़ी हुई खाट अपने अपने घर उठा के ले जाने लगे | जिसको सभी टीवी
चैनलों और मिडिया के अन्य माध्यमों ने बहुत ज्यादा कवरेज दिया , शायद उतना राहुल
गाँधी के भाषण को न मिला हो |
पुरे दिन ट्वीटर ट्रेंड रहा #खाटसभा #खाट
इत्यादि | फेसबुक पर तरह तरह के भद्दे मजाक भी बने | पर शायद खुद को पढ़ा लिखा और
तकनिकी ज्ञानी मानकर लोग यह भूल गए की एक आम ग्रामीण इंसान के लिए खाट की क्या
इज्जत है और उसके जीवन में कितना महत्व है |
एक शहरी इंसान जिसके पास सारी सुख सुविधाएं है
वह घर बैठे ऐसे ही मजाक बना सकता है क्योंकी उसको पता ही नहीं की उसके जीवन स्तर से निम्न जीवन स्तर जी रहे उन
ग्रामीणों के लिए वह एक खाट उनके आराम से सोने के लिए एक आधार है तो एक मरीज़ को ले
जाने के लिए एम्बुलेंस | आज भी जा कर देखिये दूर दराज के गाँवों को जहाँ ढंग की
सड़के तक नहीं , बस गाड़ी की तो बात ही बहुत दूर की है | ढंग के स्कूल नहीं अगर हैं
भी तो 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं , जहाँ लोग अपने बच्चों को प्राइमरी के बाद की
शिक्षा के लिए भेजते हैं | शहर जाने के लिए 2-2 पैसे जोड़ने पड़ते हैं |
पर हम लोग तो मजाक ही उड़ायेंगे क्योंकी हमारी
शहरी मानसिकता के अनुसार सभी ग्रामीण तो पिछड़े हैं | खाट तक नहीं छोड़ते , ले के
भाग जाते हैं .... अब आप ही बताइए की जब सभा ख़त्म हो गयी और उस खाट का कोई उपयोग
नहीं है तो लोग क्या करें ????
एक खाट उनके लिए , उस शहरी बेड से कहीं ज्यादा
है तो फिर क्यों न ले जायें ???
हर बात पर मजाक आसानी से किया जा सकता है
लेकिन सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं हो सकती |
दूसरों पर हँसना ज्यादा आसान होता है .....
बुधवार, 14 सितंबर 2016
सम्बन्ध और अविश्वास
सम्बन्ध
और अविश्वास
स्रोत : गूगल
सम्बन्ध – सम बंध , समान रूप से दिल के एक
धागे में बंध जाना होता है सम्बन्ध | एक बेटे या बेटी का अपने मां –पिता से , एक
बहन का भाई से , एक दोस्त का दोस्त से | जहाँ देखेंगे वहीँ है सम्बन्ध .... बिखरा
पड़ा है , कहीं हँसता तो कहीं रोता तो कहीं घुटता और सिसकता |
अविश्वास – यह हिन्दी व्याकरण से निकला हुआ
ऐसा शब्द है जो सभी सम्बन्ध ख़राब करता है यह सकारात्मक छाप नहीं छोड़ता , कहीं भी
अविश्वास सिर्फ भ्रम , शंका, और दुराव ही पैदा करता है |
फिर भी सम्बन्ध और अविश्वास में चोली दामन का
साथ है | जब सम्बन्ध में व्यापार होने लगता है , जब स्वार्थ हावी हो जाता है , जब
व्यक्तिगत हित की बातें और घमंड को पानी दिया जाने लगता है , जब किसी दुसरे के
कहने से एक दुसरे की दृष्टि शंकालु हो जाती है तब ...... तब सम्बन्ध चीखना चाहता
है लेकिन चीख नहीं पाता , रोना चाहता है पर आंशु ही नहीं होते , बहुत दूर तक नंगे
पैर भागना चाहता है लेकिन रास्ता ही नहीं होता | भरोसा टूटता है , दिल टूटता है,
भावनाएं आहत होती हैं | अविश्वास मुस्कुराता है , सम्बन्ध घिघियाता है पर उसे
महसूस करने वाला तो शुन्य हो जाता है फिर कौन उस सम्बन्ध को और उस अविश्वास को
समझने वाला होता है ???? सिवाय खुद के ....
समझ सम्बन्ध बनाता है , पर जब समझ ही कहीं
सिमट जाये , कोई मोड़ दे , कोई भरोसे को ही तोड़ दे तो फिर , कैसा और कहाँ का
सम्बन्ध ??
बोली के आधार पर , जिले के आधार पर , प्रान्त
के आधार पर , देश के आधार पर कितने समाज में बंट के भी एक हैं सब, फिर भी सम्बन्ध नहीं क्योंकी अविश्वास इतना
गहरा है की कभी सम्बन्ध होने ही नहीं देगा, बनने ही नहीं देगा |
फिर भी आइसोलेशन के शिकार है लोग , भुलभुलैया
में भटक रहे लोग , खोज रहे लोग ... इंसान नहीं , ‘गुलाम’|
जिस पर भरोसा न सही अविश्वास के साथ ही रखें
और जब मन भगा के अपने घमंड की तुष्टि कर लें और दुनिया को बताते फिरे की हमने पुरे
मानव जाति पर एहसान कर दिया और खुद ही मुस्कुरा लें , खुद ही गा लें | लोंगों से
ताली बजवा लें | खुद ही दार्शनिक बन जायें , खुद ही ज्ञान बाँट दें ...उन्ही
गुलामों को जो मेरे लिए काम कर के अपनी रोज़ी रोटी चलाते हैं | हम दुनिया के बादशाह
बन जाते है और मान लेते हैं की हमने ही धरती बनायीं, आकाश और हवा के साथ पानी
बनायीं | हम ही ब्रह्म हैं , हमसे ही दुनिया चल रही है ....
-विन्ध्या सिंह
गुरुवार, 1 सितंबर 2016
विपरीत बोल , नाम का शोर
विपरीत बोल , नाम का शोर
अभी हाल में ही शोभा डे के बयान से आप सभी वाकिफ़ होंगें | पर शायद वह ओलंपिक के दबाव और खेल भावना से वाकिफ़ नहीं हैं, तभी तो खिलाड़ियों के मनोबल बढ़ाने के बजाय , उनका मनोबल तोड़ने वाला बयां देकर सुर्खियाँ बटोरने में लगी हैं |
विपरीत बोल ,नाम का शोर ... पब्लिसिटी का एक टूल है जिसे कथाकथित सेलिब्रेटी जब चाहे तब कुछ भी उल्टा बोल के अपने नाम को ट्विटर टैग में टॉप पर रहने के लिए उपयोग कर सकते हैं | ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते की इसका असर खिलाड़ियों के दिमाग पर क्या पड़ेगा | शोभा डे , या इन जैसे लोग जो समय- समय पर विपरीत बात बोल कर अपने आप को बहुत बड़ा बुद्धजीवी प्रूव करते है , 100 मीटर दौड़ने में नानी –दादी याद आ जाएँगी | ऐसे लोग खुद से निम्बू पानी बना के भी नहीं पी सकते , थकान हो जाती है, और खिलाडियों को , जो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उनको यह बोल रही की – वो पैसे, समय की बर्बादी करने और सेल्फी लेने रियो गए हैं |
शोभा डे , अगर आप भी पुरे देश का प्रतिनिधित्व करती और आपके किसी जीत या कार्य से देश का झंडा ऊँचा होता तो आपको भी फक्र होता | किसी देश का खिलाड़ी जीतता है और जब उसके देश का झंडा ऊँचा उठता है तब उस खिलाड़ी की आंखे ख़ुशी से नम हो जाती हैं | पर आपको पब्लिसिटी पसंद है ,चाहे वह जैसे मिले, जिस स्तर पर गिर कर मिले |
एक खिलाड़ी गुमनामी के अँधेरे में मेनहत करता है , उसके मेनहत को कोई नहीं देखता लेकिन वही खिलाड़ी अपने मेनहत के बल पर ओलंपिक में भाग लेता है और जीतता है तब हम जानने लगते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं | हारने पर हम उसकी मेनहत पर शक करते है, लेकिन यह भूल जाते है की जिस खेल में हमारे देश का खिलाड़ी भाग ले रहा है उसमें विश्व के अनेक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं | और उस खेल में जीतने के लिए सभी खिलाड़ी अपना 100 प्रतिशत देते हैं , परन्तु हर खेल में दो ही चीज़ होती है – या तो जीत या फिर हार | पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं की उस खिलाड़ी ने अपना 100 प्रतिशत नहीं दिया | हर खिलाडी जब वह अपने देश के लिए खेलता है तब वह जीत कर अपने देश के झंडे को ऊँचा करना चाहता है , अपने देश के लोंगों को गर्व करने का एक मौका देना चाहता है , वह चाहता है की दुनिया के लोग उसके देश को जाने |
पर कथाकथित बुद्धजीवियों को सिर्फ अपने आपको मीडिया में हाईलाइट करने से आगे जंहा दिखता ही नहीं |
काश! कभी देश के खेल की तैयारियों के बारे में सोचते की क्रिकेट को छोड़कर बाकि किस खेल के लिए लोग कितना सोचते हैं ? कितने लोंगों को ओलंपिक में गए 5 खिलाडियों का नाम याद होगा ? या कितने तरह के खेल होते है ?
मीडिया फोबिया और बेतुकी बातों को छोड़ , कभी अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश कीजिये , कुछ मेडल तो आ ही जायेंगे |
- विन्ध्या सिंह
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