राहुल
गाँधी की बस यात्रा, बस ! यात्रा ..
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पिछले कई दिनों से
राहुल गाँधी, उत्तर प्रदेश की यात्रा पर रहे | देवरिया से दिल्ली तक | अब वह दिल्ली
अपने दरबे में आ गए हैं , बहुत सुकून मिला होगा उन्हें, किसी तरह यात्रा पूरा तो
हो गया | प्रशांत भूषण (रणनीतिकार,पेशेवर) क्या-क्या करवायेंगे, शायद यही सोच के राहुल
जी थक जाते होंगे |
बेसक राहुल गाँधी ने
इतनी लम्बी यात्रा की लेकिन क्या वह उत्तर प्रदेश में धरातल से भी नीचे जा चुकी
कांग्रेस पार्टी में जान फूंक पाए ?? क्या किसानों, युवाओं, बेरोजगारों और यूपी की
जनता का दिल जीत पाए ? क्या उनसे जुड़ पाए ?
अगर बात करें की
पार्टी में जान फूंक पाए तो यह कहा जा सकता है की कुछ तो प्रभाव पड़ा ही हैं आम कार्यकर्ताओं
में , लेकिन वह कितने देर रहेगा यह सोचने की बात है | रही बात दिल जीतने और लोंगों
से जुड़ने की तो वह न के बराबर ही रही | दरअसल राहुल गाँधी, परिस्थिति और लोंगों के
हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाते और ना ही खुद से कुछ बोल पाते हैं | और यह उनके
नेतृत्व की क्षमता पर सवालिया निशान भी लगाता है | रटी- रटायें बातें एक बार अच्छी
लग सकती हैं, हर बार एक ही बात बोलने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता | यही दोहराव हर बार
राहुल जी के भाषण में देखने के लिए मिला | मोदी का विरोध और कुछ मांग जैसे –
किसानों का कर्जा माफ़, बिजली बिल हाफ़, और क्षेत्र के हिसाब से कुछ जोड़ लिया –
पूर्वांचल में बेरोजगारी, बुंदेलखंड में सुखा तो पश्चिमी यूपी में चीनी मीलों की
बात |
क्या राहुल गाँधी को
यह लगता है की जनता कुछ नहीं जानती या फिर इन्हीं को कुछ नहीं मालूम ? आज भी इनके
पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में वही पुराने कांग्रेसी लोग आते हैं जो राजीव गाँधी
और इंदिरा गाँधी के ज़माने से जुड़े हुए है | नए लोग कम ही आते हैं अगर आते भी है तो
बस पार्टी में कोई पदाधिकारी बनने या फिर किसी पदाधिकारी के साथ भीड़ बनकर |
यूपी की जमीन पर
राजनीति, दिल्ली से कभी नहीं हो सकती | वहां का राजनीतिक समीकरण और जनता का रुझान
मीडिया के दलीलों से नहीं समझा जा सकता | उत्तर प्रदेश जीतने के लिए पहले वहां के
लोंगों का दिल जीतना पड़ेगा | दिल्ली के युवा की तरह सिर्फ फ्री वाई-फाई के लिए
सरकार नहीं बनाते यूपी के युवा , वहां के लोग एक उम्मीदों के लिए सरकार बनाते हैं
की उनकी परेशानी दूर हो सके | बिजली मिले, किसानों को खाद- बीज और सस्ते क़र्ज़ मिले
, चीनी मिल चालू हो , फसलों का समर्थन मूल्य मिले , युवा बेरोजगारों को रोजगार
मिले, महिलाओं को चिकित्सीय सुविधा के साथ सम्मान मिले , बच्चों को अच्छी शिक्षा
मिले | लेकिन इतने वर्षों के आज़ादी के बाद यूपी में, बस कुछ-कुछ बदला है ,और वह भी
समय की देन है | सरकार तो कितनी बनी लेकिन समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी रहीं |
स्वघोषित राजनेताओं ने राजनीती को विकास के चकरघिन्नी से निकाल कर जातिवाद की तरफ मोड़
ले गए | जातिगत समूहों को लगा की अब तो कुछ विकास होगा पर वहां भी छलावा ही रहा |
कभी मंदिर तो कभी मस्जिद ... सब हो गया पर कोई ऐसा नहीं मिला जो उत्तर प्रदेश को
उसकी हालत और हालात से बहार निकाल कर लोंगों के उम्मीदों को पंख दे सकें | हर बार
नई उम्मीदों के साथ लोग सरकार चुनते है और बस ठगे जाते हैं |
राहुल गाँधी के
नेतृत्व और बात में, यह कहीं नहीं झलकता की वहां की जनता उनसे कोई उम्मीद कर सकती
है | बहुत सफ़र तय करना होगा राहुल जी को .... एक तरफ अखिलेश यादव एक युवा सीएम और
अपने काम को लेकर जाने जाते है तो दूसरी तरफ मायावती भी अपने शासन से प्रभावित की
हैं | बीजेपी की बैतरनी मोदी जी के सहारे है पर बिहार चुनाव को देखते हुए कुछ कहा
नहीं जा सकता | राहुल गाँधी के पास खुद को स्थापित और साबित करने का एक बेहतरीन
मौका है लेकिन वह अपने पहले ही प्रयास में कुछ ख़ास नहीं कर पाए जबकि देवरिया से
दिल्ली तक की यात्रा भी पूरी हो गयी |