सोमवार, 2 अप्रैल 2018

अपने पड़ोसियों को नज़रंदाज करता भारत



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चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, भूटान, नेपाल देश भारत के पड़ोसी देश हैं और बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे हैं की पड़ोसियों से रिश्ते मधुर रखना चाहिए, क्योंकि दूर के रिश्तेदार बाद में आते हैं लेकिन पड़ोसी तुरंत मौके पर उपस्थित रहते हैं |
पर शायद अब भारत यह भूल गया है और उसे पड़ोसियों की कोई फ़िक्र नहीं | बस, अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भर रहा है जो खतरे की घंटी है | भारत भले ही चीन के साथ अपने संबंधों को सहज देख रहा हो , पर चीन इसे अलग नजरिये से देखता है इसे आप सीमा पर हुए गतिरोध से समझ सकते हैं | चीन हमेशा से प्रसारवादी नीति का समर्थक रहा है , यहाँ तक की भारत के साथ अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर क्षेत्र के हिस्सों को लेकर अपना दावा करता रहा है और वह इसके प्रति सतर्क भी है | हाल के दो वर्षों की घटनाओं से आप यह समझ सकते हैं | हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी मुसीबत में पड़ने के बाद ही आया जो इतने सालों बाद भी बस एक जुमला बन के रह गया है |

भारत के यह पड़ोसी अब पराये बन रहे हैं , ताज़ा मामला मालदीव का ही देखें तो, दो टूक समान अधिकार शब्दों के माध्यम से चीन ने भारत को इस मामले से दूर ही कर दिया जबकि भारत ने मालदीव के तख्तापलट के संकट में भरपूर साथ दिया था | अब वहाँ के विपक्ष में भारत के प्रति नकारात्मकता पनपने लगी है | बगल में श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लगभग चीन को ही सौंप चुका है और भारी निवेश भी कर रहा है | वहीं चीन ने म्यांमार के साथ 24 अरब डॉलर का वित्तीय समझौता किया है तथा वहां एक बंदरगाह का निर्माण भी कर रहा है | नेपाल की मार्क्सवादी ओली सरकार का झुकाव चीन की तरफ है और चीन भारी मात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है , सिर्फ यही नहीं चीन से नेपाल के लिए ट्रेन की लाइन बिछाने पर भी काम चल रहा है इस तरह चीन की पहुँच नेपाल के रास्ते भारत के सीमा तक होगी | भूटान, एक ऐसा देश है जो भारत का साथ दे रहा है लेकिन चीन के लगातार दबाव को वह सहन करता है और वह दिन दूर नहीं जब भूटान भारत के पाले से निकल कर चीन की ओर खड़ा होगा | बांग्लादेश में अभी सबसे बड़ा निवेशक चीन ही है , भले इस देश की सीमायें भारत से जुड़ी हैं लेकिन वहां का राजनीतिक समीकरण भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है | रही बात पाकिस्तान की तो अब यह बात धीरे-धीरे पूरा विश्व समुदाय जानने लगा है की पाकिस्तान अब पूरी तरह चीन के साथ है जहाँ चीन यहाँ अनेक स्तर पर निवेश कर रहा है वहीँ ग्वादर बंदरगाह को बनाकर हिन्द महासागर तक अपनी पहुँच बनाते हुए स्पेशल आर्थिक जोन बनाते हुए पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते सुगम यातायात व्यवस्था के लिए सड़क निर्माण भी कर रहा है | भारत ने इसपर अपनी आपत्ति भी जताई है लेकिन यह बहुत कारगर नहीं रही है |

पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादियों के पनाह के देश के रूप में घोषित कराने में भारत को भले सफलता मिली हो लेकिन चीन उसके विकास में भरपूर सहयोग दे रहा है | यदि पाकिस्तान के साथ भारत का किसी भी तरह का युद्ध होता है तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना होगा | चीन अपने बड़े रणनीति के अनुसार भारत के सीमा पर अतिक्रमण कर उकसा रहा है और इधर पाकिस्तान घुसपैठ करा कर भारत के नाक में दम कर रखा है | भारत अपने विदेश नीति में पिछड़ता जा रहा है और चीन को एक तरह से वाक ओवर देता जा रहा है | चीन विश्व मंच पर भी भारत की खिलाफत करता रहा है चाहे वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देश की सदस्यता हासिल करना हो |


साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में ज्यादा से ज्यादा निवेश करके भारत को चारो ओर से घेरता जा रहा है और भारत अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भरता जा रहा है | चीन खुद को एशिया के एकमात्र  महाशक्ति के रूप में देखता है और उसी अनुरूप आचरण भी कर रहा है , वह कभी नहीं चाहेगा की भारत उसके समकक्ष खड़ा हो सके | उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को समर्थन देकर वह अमेरिका जैसे देश को आँख दिखाकर यह बताना चाहता है की वह उसके बराबर है | भारत का पड़ोसियों को अनदेखी करना अमेरिकी दोस्ती पर भारी पड़ेगी | भारत को अब भी सचेत होने की जरुरत है , अपने पड़ोसियों को समझने की जरुरत है अन्यथा चीन, भारत को एक ड्रैगन की तरह निगल जायेगा |  

(यह हमारे निजी विचार हैं , विदेश नीति एक बहुत बड़ा कांसेप्ट है और मैं उसके आस-पास भी नहीं फटकता , लेकिन विभिन्न समाचारों एवं लेखों इत्यादि के माध्यम से इस विषय में लिखने का विचार आया तो लिख दिया | यदि आप किसी बात से असहमत हो तो आप कमेंट में जरुर लिखें , यह जरुरी नहीं की मैं इस मुद्दे पर ज्यादा जनता हूँ आप कुछ भी अच्छा लिखेंगे तो यह मेरे लिखने में और सुधार ही करेगा |)


गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

सिंगुर का किसान ‘न घर का रहा न घाट का’



       फोटो : गूगल

सिंगुर , शायद आपने नाम सुना हो !
एक समय ऐसा था जब सभी समाचार पत्र , न्यूज़ चैनेल इस नाम से अपनी टीआरपी बढ़ाने में लगे हुए थे | लेकिन आज कोई सिंगुर की हालत पर बात नहीं करता | पश्चिम बंगाल का यह जगह कभी टाटा नैनो की लखटकिया परियोजना के लिए पुरे देश में चर्चा का विषय रहा | साथ ही यह किसानों की जमीन से जुड़ा मुद्दा भी रहा , कुछ किसानों ने खुद अपनी जमीन इस परियोजना के लिए दे दी, तो कुछ सरकार ने जबरदस्ती ले लिया | आन्दोलन हुए, राजनीति हुयी और फिर वाम सरकार को कई दशकों का शासन छोड़ना पड़ा | ममता बनर्जी , इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयीं, सुप्रीमकोर्ट तक लड़ाई लड़ी गयी और फिर किसानों के पक्ष में आदेश भी आया ,तत्पश्चात  नैनों प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा जो गुजरात चला गया | जमीन वापस किसानों को दी जाने लगी और साथ ही प्रभावित किसानों को प्रति महीने कुछ रूपये और सस्ते अनाज भी | ..... जिस जमीन पर यह परियोजना बन रही थी उसके बहुत सारे हिस्से पर कार्य चल रहा था जो लगभग आधा के करीब पहुँच गया था, जिस जमीन पर लहलहाती खेती हुआ करती थी वहां बस कंक्रीट के ढांचे और खम्भे खड़े दिखाई देने लगे | सड़कें पक्की बन गयी और ड्रेनेज सिस्टम भी बन गया .... मतलब पूरा आधार तैयार हो गया | फिर ........

किसानों को जमीन वापस दे दी गयी , अब किसान ‘न घर का रहा न घाट का’ | उस मजबूत बने कंक्रीट के आधार पर वह दुबारा खेती नहीं कर सकता और उसे हटाने में मानव श्रम काफी नहीं हैं तथा सरकार उसे हटाने के लिए कोई प्रयास भी नहीं कर रही है यदि मनरेगा के तहत उसे हटाने की कवायद चल भी रही है तो वह कितने वर्षों में हटेगा यह आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं | क्या होगा सिंगुर के किसानों की हालत ? आप सोच के ही दुखी हो जायेंगे , वह तो भुक्तभोगी हैं | जिन किसानों की आजीविका खेती से चलती थी वह आज मजदुर बन गए , कुछ ने उम्मीद लगायी होगी की फैक्ट्री चलेगी तो रोजगार के कुछ न कुछ साधन बन ही जायेंगे , बन ही जाते | लेकिन वह भी नहीं हुआ ... अब उस क्षेत्र की जनता को वहीँ के नेताओं ने उस हालत में ला दिया जिसे वह कभी सपने में भी नहीं सोचे होंगें | ऐसे अदूरदर्शी फैसले से लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे न तो सरकार जानना चाहती है और न ही अधिकारी | देश बोलने से नहीं करने से बदलेगा .... पर किसी को क्या फर्क पड़ता है जब सिंगुर के किसान का लड़का अपनी पढ़ाई छोड़ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में मजदूरी करे, रिक्शा चलाये , पकौड़े बेचे , और एक ऐसी जिंदगी जिए जिसे वह कभी जीना नहीं चाहता रहा हो | एक ऐसे परेशानी से गुजरे जिसे स्थानीय राजनेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए खड़ी किये हों | भारत की अधिकांश जनता अभी भी कृषि पर जीवनयापन कर रही है लेकिन आप उसे वहां भी जीने नहीं देना चाहते | एक किसान होना उस भगवान होने जैसा है जो हमें अन्न देता है लेकिन आप उसके ही खेत को छीन कर उसे ही भूमिहीन बना दिए , मजदुर बना मज़बूरी की जिंदगी जीने के लिए बेबस कर दिए | यदि इस तरह किसी के जीवन को बर्बाद कर विकास करना चाहते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब पुरे देश में असंतोष होगा और लोग जीने के लिए एक दुसरे को मारते फिरेंगे | किसी विशेष क्षेत्र में अपराध बढ़ने का यह भी एक कारण होता है | हम किसी फैक्ट्री या परियोजना का विरोध नहीं करते , हाँ ! बस वह वहां की जनता के हित के लिए होना चाहिए ..... भविष्य में कोई सिंगुर न बने इस उम्मीद के साथ , जय हिन्द ! 
Reference : www.thewirehindi.com

शुक्रवार, 5 मई 2017

बर्बरता के लिए कोई माफ़ी नहीं - सुप्रीमकोर्ट

आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने यह साबित कर दिया की देश के न्यायतंत्र में देर भले ही है पर अंधेर नहीं है |
निर्भया केस में कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को जस का तस रख कर , दोषियों के मौत की सजा को बरकरार रखा है |
यह निर्णय एक नज़ीर है और आने वाले समय में कोई भी ऐसी गन्दी और क्रूर हरकत करने के पहले १००० बार सोचेगा |
जिस तरह कोर्ट ने इसे बर्बर कृत्य बताते हुए इसे क्रूरता की सुनामी के रूप में परिभाषित किया उससे इस केस की गंभीरता प्रदर्शित होती है |
निर्भया के माँ पिता के संग भारत के प्रत्येक संवेदनशील लोंगों को यह फैसला बहुत ही राहत देने वाला है |
निर्भया के पिता ने कहा भी – “ हम सुप्रीमकोर्ट के निर्णय से बहुत खुश है , देर सही पर मुकम्मल निर्णय है |”

निःसंदेह यह निर्णय न्यायतंत्र में एक विश्वास जगाता है और इस बात पर विराम लगाता है की न्याय व्यवस्था बहुत ही लचर हो चुकी है |

बुधवार, 3 मई 2017

नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों का भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए

सुप्रीमकोर्ट द्वारा सराहनीय पहल ! शिक्षामित्रों को किया जा सकता है बर्खास्त | अखिलेश सरकार ने वोट की राजनीति में नौनिहालों के जीवन से जो खिलवाड़ शुरू किया था , अब वक़्त आ गया है की यह सब बंद हो | पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षकों की जगह शिक्षामित्रों को रखकर पुरे बेसिक शिक्षा के साथ मजाक किये अखिलेश सरकार | अब यूपीटेट २०११ के सभी उत्तीर्ण लोंगों को पूर्ण समायोजन किया जाना चाहिए | शिक्षामित्रों से कोई विरोध नहीं है लेकिन जो गलत है वह गलत है उनकी नियुक्ति ही अवैध और असंवैधानिक तरीके से हुयी |

साथ ही प्राईमरी स्कूल के बच्चों के ड्रेस के बारे में भी बात करना चाहता हूँ | आप देखते होंगे की छोटे प्यारे बच्चे स्कूल ड्रेस में खाकी रंग का पेंट और शर्ट दोनों ही पहने हुए होते हैं ऐसे लगता है की सब मजदूर बनने या पुलिस बनना चाहते है | आखिर अखिलेश सरकार ऐसा ड्रेस कोड बना के क्या सन्देश देना चाहती थी ??? की सब बच्चे नॉन स्किल लेबर और पुलिस होमगार्ड बनने से ज्यादा ना सोच पाएं ??? उनके सोच को बस वहीँ तक समेट दें की वह आगे की सोचे ही ना और हम उत्तर प्रदेश में राज करते रहें | जरा सोचिये इन सब चीजों का एक बच्चे के ऊपर क्या असर पड़ता है तब समझेंगे ... इस तरह का ड्रेस बदलना चहिये | उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को सुधार कर ही प्रदेश को उदीयमान बनाया जा सकता है , तभी असली विकास होगा | नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों की जिंदगी और भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए |

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

जन्नत यहीं है धरती पर

स्रोत :गूगल 

खुदा ने इंसान को इस धरती पर धर्म का ढ़िँढोरा पीटने के लिये नहीं भेजा है । इंसानियत के वजूद को बनाये रखने के लिये भेजा है । धर्म इंसान के बाद आता है क्योंकि यह जितने भी धर्म है किसी खुदा ने नहीं इंसानों ने बनाया और तथाकथित धर्मगुरुओं ने उसे अपने अनुसार परिभाषित किया है । किसी भी धर्म में महिलाओं को दासी बनाकर रखने की इजाजत नहीं है और ना ही उनके अधिकार छीनने की बात है , धर्म शब्द की गलत व्याख्या कर के इंसानियत को खत्म कर रहे हैं धर्मान्ध लोग । जन्नत यहीं है धरती पर , और उसकी खुबसूरती महिलाओं से है । वही निर्माण करती है । सिर्फ भभकती बातें और गंदी गाली और अधुरे ज्ञान से विक्षिप्त मानसिकता की प्यास बुझ सकती है लेकिन सच यही है की पुरुष हो या महिला सबको जीने का बराबर अधिकार है । महिलाओं का यह अधिकार है की उनको क्या पहनना है क्या करना है इसमें धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ... इंसान है तभी धर्म है नहीं तो धर्म का कोई वजूद नहीं |

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

बदलाव के नायक

बदलाव के नायक

राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है ‘बदलाव’ | राजनीति में जाति विशेष की बहुलता के साथ ही समय समय पर नायक भी बदले जाते हैं | भारत की वर्तमान राजनीति में दलित वर्ग को सभी पार्टियाँ बहुत ही प्यार भरी नज़र से देख रहीं हैं और अपने अपने तरीके से डॉ भीमराव आंबेडकर को अपना नायक बताने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं | आज अम्बेडकर सभी राजनितिक दलों की जरुरत बन गए हैं | ऐसा लगता है की सत्ता की चाबी हैं, अम्बेडकर | खैर , उच्च वर्ग से धीरे धीरे निम्न वर्ग की तरफ झुकती हुई पार्टियाँ यह एहसास तो दिला रही है की दलित मजबूत हुआ है और हो रहा है तथा यह इस बात का द्योतक है की समाज अपने बेहतर अवस्था में आने के लिए अंगड़ाई ले रहा है |
पर एक प्रश्न हमेशा ज़ेहन में रहता है की क्या यह राजनितिक पार्टियाँ बस चुनावी लाभ के लिए ही दलित प्रेम दिखाती है या वास्तव में इनके दिल में वह प्यार है ?
हालाँकि सीधा सीधा तो बस यही लगता है की यह बस एक दिखावा ही है | वोट मिल जाये और फिर काम निकल जाये | पार्टियों का मुख्य उद्देश्य तो यही रहता है की दलित वर्ग या पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को पार्टी में लायें और उस समाज का वोट उस आधार पर पाएं | क्योंकी यह जो समाज के आधुनिक उद्धारक हैं वह सिर्फ अपना फायदा देखते हैं इनको खुद के ही समाज से ज्यादा सारोकार नहीं होता है | ऐसा उदाहरण आप यूपी, बिहार के राजनीति में आसानी से देख सकते हैं | अभी यूपी में चुनाव आने वाला है और राजनितिक पार्टियाँ अपना रंग बदलने लगी हैं , इसलिए दलितों के बहुत सारे नायक दिखेंगे जो माइक पर चिल्ला चिल्ला कर यह बताएँगे की वही उनके नायक हैं और वही समाज में बदलाव लायेंगे | जो पिछले हजारों वर्षों से चल रहा है ........


गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव


यूपी विधानसभा का चुनाव अगले साल फ़रवरी-मार्च तक होने की संभावना है | बोर्ड की परीक्षा को देखते हुए ,पहले या बाद में चुनाव हो सकते हैं | चूँकि चुनाव है और सभी पार्टियाँ अपने अभियान को धार देने में जी-जान से जुटी हुई हैं और साथ ही मौजूदा सरकार अपने पांच वर्ष के कार्य को प्रचारित –प्रसारित भी कर रही है | भाजपा मोदी के सहारे , सपा अपने किये गए कार्य के सहारे, बसपा विरोध के सहारे,तो कांग्रेस खाट पंचायत के सहारे और अन्य पार्टियाँ अपने अपने गोलबंदी के सहारे , तरह तरह के अभियान चला रखीं हैं | सभी अभियान का लक्ष्य यूपी में बहुमत पाना और सरकार बनाना है | इन सबके बाद बात आती है जनता की, आखिर जनता क्या चाहती है | चूँकि संविधान में जनता जनार्दन को यह सोचने का अधिकार तो दिया ही गया है की वह किसको अपना सरकार और भाग्य विधाता चुनेगी | (अपने अनुभव द्वारा, उत्तर प्रदेश के लोंगों से मिलने और गाँव गाँव घुमने के बाद) जहाँ तक लोंगों की बात करें तो लोग मौजूदा सरकार के कार्य से तो थोड़ा बहुत खुश हैं, ख़ासकर युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से | लेकिन लोग दुबारा सत्ता नहीं सौपना चाहते ( इसके बहुत से वजह हैं , जिन पर यहाँ चर्चा करना ठीक नहीं) | दूसरी तरफ विपक्ष और विरोधी पार्टी बसपा, जिनके शासन-प्रशासन और पारदर्शिता को अब लोग दुबारा याद करने लगे है ( भ्रष्टाचार को छोड़ के) और साथ ही दलित वर्ग का समर्थन भी है | इनकी बातें ज्यादा हो रहीं है और सरकार बनाने के दौड़ में फ़िलहाल आगे हैं | भाजपा का कोई चुनावी चेहरा नहीं है और बिहार के बाद एक बार फिर पूरा दारोमदार मोदी जी पर है , साथ ही पार्टी में टिकट को लेकर अंदरूनी कलह की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता | अपने-अपने क्षेत्र के महारथी टिकट बंटवारे को लेकर कलह कर सकते है साथ ही मुख्यमंत्री कौन होगा यह भी तय नहीं है | जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर समाज को साधने की कोशिश तो हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर हिंदुत्व कार्ड को छोड़कर बाकि ऐसा कुछ नहीं है जिससे जनता का रुझान भाजपा की तरफ हो | फिर भी पाकिस्तान के विरोध और सर्जिकल स्ट्राइक के पापुलरिटी इनको फायदा पहुंचाएगी और सरकार बनाने की दौड़ में यह भी सबसे आगे हैं | कांग्रेस के राहुल गाँधी खाट पंचायत कर कर के कार्यकर्ताओं में कुछ जान तो फूंके है लेकिन यह संजीवनी प्रदेश में सीट दिला पायेगी इसका भरोसा नहीं है | एक बात हो सकता है की अगर कुछ सीटें इनको मिली तो यह किंगमेकर की अवस्था में आ सकती है | यह पार्टी सपा या बसपा किसी से मिलकर भाजपा को रोकने की कोशिश भरपूर करेगी |
जनता अब बहुत समझदार हो गयी है तथा देश और प्रदेश के चुनाव के महत्व को जानती है | बिहार चुनाव इसका उदहारण है लेकिन साथ ही साथ असम का चुनाव भी बिता है तो सटीक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता | जनता की बातों और रुझान से बसपा अभी आगे है परन्तु भाजपा भी अपने संगठन, प्रचार और मोदी के कार्य के साथ विकास को मुख्य मुद्दा बनाते हुए , मैदान में ललकार रही है | इन बातों के बाद एक लाइन याद आ गया –
“उम्मीदों का प्रदेश, उत्तर प्रदेश”


पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...