क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?
युद्ध का नाम आते ही
उसकी भयावहता आँखों के सामने तैरने लगती है | फिर भी युद्ध का उन्माद बना हुआ है ,
कहीं वाजिब कारण है तो कहीं बिना किसी कारण के | आज युद्ध का उद्देश्य बदल गया है
| राजाओं और मुग़ल शासकों ने अपने राज्य, सिंहासन और राज्य विस्तार के लिए युद्ध
लड़ा और आज धर्म के विस्तार के लिए युद्ध हो रहें हैं | जहाँ तक सभी धर्म के मूल की
बात करें तो किसी धर्म ने बिना वज़ह युद्ध की इज़ाज़त नहीं दिया लेकिन कुछ विकृत
मानसिकता के धर्मगुरु ( किसी भी धर्म के ) लोंगों को बरगला कर धर्मयुद्ध में ढकेल
रहे हैं |
शांति और मानवता के
पुजारी बस इतिहास के पन्नों और अपने जन्मतिथियों तक सिमट गए हैं | सत्य और अहिंसा
बस कोरी बातें साबित हो रही हैं | कोई जबरदस्ती युद्ध थोप रहा है तो कोई अपने बचाव
में युद्ध कर रहा है | सभी वैश्विक शक्तियां अपने अपने फायदे और बाजारीकरण के
फ़िराक में बस मूक दर्शक बनी देख रहीं हैं |
भारत देश , एक
संप्रभु और गणतंत्र राष्ट्र के रूप में जाना जाता है लेकिन पड़ोसी मुल्क अपनी
हरकतों से बार बार युद्ध के लिए उकसा रहा है | आखिर एक कश्मीर की वजह से कितनी
जानें जाएँगी और कितनी राजनीति होगी ???
कश्मीर भारत का अंग
है यह जानते हुए भी पड़ोसी मुल्क लगातार घुसपैठ करके निर्दोष सैनिकों और नागरिकों
को मार रहा है | और सम्पूर्ण विश्व के सामने अपने कुरूप चेहरे को अपने बातों से
ढकने का प्रयास कर रहा है |
एक कहावत है – “ सौ
सुनार की और एक लोहार की | जो वर्तमान स्थिति में पड़ोसी मुल्क पर सटीक बैठता है |
लेकिन भारत देश शांति का देश है | यह ऐसा देश है जहाँ युद्ध नहीं प्यार की बात पर
जोर दिया जाता है | क्योंकी शक्तिशाली व्यक्ति बहुत उदार होता है तब तक जब तक
अंतिम स्थिति में मामला न पहुँच जाये |
पड़ोसी मुल्क को यह
समझना चाहिए जो वह कभी समझना नहीं चाहेगा कि शांति और अमन से नागरिकों का ख्याल
करके गरीबी और अशिक्षा को दूर कर राष्ट्र के विकास में ध्यान लगाना चाहिए | 70 साल
गुजरने के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया | भारत जैसा देश खुद को संभालते हुए
प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ओर कदम बढ़ा रहा वहीँ पड़ोसी मुल्क उसके विकास में
बाधक बनने पर तुला हुआ है | युद्ध के लिए उकसाना क्या सही है ?? युद्ध क्या देता
है ??? क्या युद्ध ही किसी बात का समाधान है ??? सबको सोचना चाहिए खासकर पड़ोसी
मुल्क के लोंगों को |




