मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

जन्नत यहीं है धरती पर

स्रोत :गूगल 

खुदा ने इंसान को इस धरती पर धर्म का ढ़िँढोरा पीटने के लिये नहीं भेजा है । इंसानियत के वजूद को बनाये रखने के लिये भेजा है । धर्म इंसान के बाद आता है क्योंकि यह जितने भी धर्म है किसी खुदा ने नहीं इंसानों ने बनाया और तथाकथित धर्मगुरुओं ने उसे अपने अनुसार परिभाषित किया है । किसी भी धर्म में महिलाओं को दासी बनाकर रखने की इजाजत नहीं है और ना ही उनके अधिकार छीनने की बात है , धर्म शब्द की गलत व्याख्या कर के इंसानियत को खत्म कर रहे हैं धर्मान्ध लोग । जन्नत यहीं है धरती पर , और उसकी खुबसूरती महिलाओं से है । वही निर्माण करती है । सिर्फ भभकती बातें और गंदी गाली और अधुरे ज्ञान से विक्षिप्त मानसिकता की प्यास बुझ सकती है लेकिन सच यही है की पुरुष हो या महिला सबको जीने का बराबर अधिकार है । महिलाओं का यह अधिकार है की उनको क्या पहनना है क्या करना है इसमें धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ... इंसान है तभी धर्म है नहीं तो धर्म का कोई वजूद नहीं |

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

बदलाव के नायक

बदलाव के नायक

राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है ‘बदलाव’ | राजनीति में जाति विशेष की बहुलता के साथ ही समय समय पर नायक भी बदले जाते हैं | भारत की वर्तमान राजनीति में दलित वर्ग को सभी पार्टियाँ बहुत ही प्यार भरी नज़र से देख रहीं हैं और अपने अपने तरीके से डॉ भीमराव आंबेडकर को अपना नायक बताने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं | आज अम्बेडकर सभी राजनितिक दलों की जरुरत बन गए हैं | ऐसा लगता है की सत्ता की चाबी हैं, अम्बेडकर | खैर , उच्च वर्ग से धीरे धीरे निम्न वर्ग की तरफ झुकती हुई पार्टियाँ यह एहसास तो दिला रही है की दलित मजबूत हुआ है और हो रहा है तथा यह इस बात का द्योतक है की समाज अपने बेहतर अवस्था में आने के लिए अंगड़ाई ले रहा है |
पर एक प्रश्न हमेशा ज़ेहन में रहता है की क्या यह राजनितिक पार्टियाँ बस चुनावी लाभ के लिए ही दलित प्रेम दिखाती है या वास्तव में इनके दिल में वह प्यार है ?
हालाँकि सीधा सीधा तो बस यही लगता है की यह बस एक दिखावा ही है | वोट मिल जाये और फिर काम निकल जाये | पार्टियों का मुख्य उद्देश्य तो यही रहता है की दलित वर्ग या पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को पार्टी में लायें और उस समाज का वोट उस आधार पर पाएं | क्योंकी यह जो समाज के आधुनिक उद्धारक हैं वह सिर्फ अपना फायदा देखते हैं इनको खुद के ही समाज से ज्यादा सारोकार नहीं होता है | ऐसा उदाहरण आप यूपी, बिहार के राजनीति में आसानी से देख सकते हैं | अभी यूपी में चुनाव आने वाला है और राजनितिक पार्टियाँ अपना रंग बदलने लगी हैं , इसलिए दलितों के बहुत सारे नायक दिखेंगे जो माइक पर चिल्ला चिल्ला कर यह बताएँगे की वही उनके नायक हैं और वही समाज में बदलाव लायेंगे | जो पिछले हजारों वर्षों से चल रहा है ........


गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव


यूपी विधानसभा का चुनाव अगले साल फ़रवरी-मार्च तक होने की संभावना है | बोर्ड की परीक्षा को देखते हुए ,पहले या बाद में चुनाव हो सकते हैं | चूँकि चुनाव है और सभी पार्टियाँ अपने अभियान को धार देने में जी-जान से जुटी हुई हैं और साथ ही मौजूदा सरकार अपने पांच वर्ष के कार्य को प्रचारित –प्रसारित भी कर रही है | भाजपा मोदी के सहारे , सपा अपने किये गए कार्य के सहारे, बसपा विरोध के सहारे,तो कांग्रेस खाट पंचायत के सहारे और अन्य पार्टियाँ अपने अपने गोलबंदी के सहारे , तरह तरह के अभियान चला रखीं हैं | सभी अभियान का लक्ष्य यूपी में बहुमत पाना और सरकार बनाना है | इन सबके बाद बात आती है जनता की, आखिर जनता क्या चाहती है | चूँकि संविधान में जनता जनार्दन को यह सोचने का अधिकार तो दिया ही गया है की वह किसको अपना सरकार और भाग्य विधाता चुनेगी | (अपने अनुभव द्वारा, उत्तर प्रदेश के लोंगों से मिलने और गाँव गाँव घुमने के बाद) जहाँ तक लोंगों की बात करें तो लोग मौजूदा सरकार के कार्य से तो थोड़ा बहुत खुश हैं, ख़ासकर युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से | लेकिन लोग दुबारा सत्ता नहीं सौपना चाहते ( इसके बहुत से वजह हैं , जिन पर यहाँ चर्चा करना ठीक नहीं) | दूसरी तरफ विपक्ष और विरोधी पार्टी बसपा, जिनके शासन-प्रशासन और पारदर्शिता को अब लोग दुबारा याद करने लगे है ( भ्रष्टाचार को छोड़ के) और साथ ही दलित वर्ग का समर्थन भी है | इनकी बातें ज्यादा हो रहीं है और सरकार बनाने के दौड़ में फ़िलहाल आगे हैं | भाजपा का कोई चुनावी चेहरा नहीं है और बिहार के बाद एक बार फिर पूरा दारोमदार मोदी जी पर है , साथ ही पार्टी में टिकट को लेकर अंदरूनी कलह की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता | अपने-अपने क्षेत्र के महारथी टिकट बंटवारे को लेकर कलह कर सकते है साथ ही मुख्यमंत्री कौन होगा यह भी तय नहीं है | जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर समाज को साधने की कोशिश तो हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर हिंदुत्व कार्ड को छोड़कर बाकि ऐसा कुछ नहीं है जिससे जनता का रुझान भाजपा की तरफ हो | फिर भी पाकिस्तान के विरोध और सर्जिकल स्ट्राइक के पापुलरिटी इनको फायदा पहुंचाएगी और सरकार बनाने की दौड़ में यह भी सबसे आगे हैं | कांग्रेस के राहुल गाँधी खाट पंचायत कर कर के कार्यकर्ताओं में कुछ जान तो फूंके है लेकिन यह संजीवनी प्रदेश में सीट दिला पायेगी इसका भरोसा नहीं है | एक बात हो सकता है की अगर कुछ सीटें इनको मिली तो यह किंगमेकर की अवस्था में आ सकती है | यह पार्टी सपा या बसपा किसी से मिलकर भाजपा को रोकने की कोशिश भरपूर करेगी |
जनता अब बहुत समझदार हो गयी है तथा देश और प्रदेश के चुनाव के महत्व को जानती है | बिहार चुनाव इसका उदहारण है लेकिन साथ ही साथ असम का चुनाव भी बिता है तो सटीक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता | जनता की बातों और रुझान से बसपा अभी आगे है परन्तु भाजपा भी अपने संगठन, प्रचार और मोदी के कार्य के साथ विकास को मुख्य मुद्दा बनाते हुए , मैदान में ललकार रही है | इन बातों के बाद एक लाइन याद आ गया –
“उम्मीदों का प्रदेश, उत्तर प्रदेश”


शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

राहुल गाँधी की बस यात्रा, बस ! यात्रा ..

राहुल गाँधी की बस यात्रा, बस ! यात्रा ..

source :Google 
पिछले कई दिनों से राहुल गाँधी, उत्तर प्रदेश की यात्रा पर रहे | देवरिया से दिल्ली तक | अब वह दिल्ली अपने दरबे में आ गए हैं , बहुत सुकून मिला होगा उन्हें, किसी तरह यात्रा पूरा तो हो गया | प्रशांत भूषण (रणनीतिकार,पेशेवर) क्या-क्या करवायेंगे, शायद यही सोच के राहुल जी थक जाते होंगे |  
बेसक राहुल गाँधी ने इतनी लम्बी यात्रा की लेकिन क्या वह उत्तर प्रदेश में धरातल से भी नीचे जा चुकी कांग्रेस पार्टी में जान फूंक पाए ?? क्या किसानों, युवाओं, बेरोजगारों और यूपी की जनता का दिल जीत पाए ? क्या उनसे जुड़ पाए ?
अगर बात करें की पार्टी में जान फूंक पाए तो यह कहा जा सकता है की कुछ तो प्रभाव पड़ा ही हैं आम कार्यकर्ताओं में , लेकिन वह कितने देर रहेगा यह सोचने की बात है | रही बात दिल जीतने और लोंगों से जुड़ने की तो वह न के बराबर ही रही | दरअसल राहुल गाँधी, परिस्थिति और लोंगों के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाते और ना ही खुद से कुछ बोल पाते हैं | और यह उनके नेतृत्व की क्षमता पर सवालिया निशान भी लगाता है | रटी- रटायें बातें एक बार अच्छी लग सकती हैं, हर बार एक ही बात बोलने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता | यही दोहराव हर बार राहुल जी के भाषण में देखने के लिए मिला | मोदी का विरोध और कुछ मांग जैसे – किसानों का कर्जा माफ़, बिजली बिल हाफ़, और क्षेत्र के हिसाब से कुछ जोड़ लिया – पूर्वांचल में बेरोजगारी, बुंदेलखंड में सुखा तो पश्चिमी यूपी में चीनी मीलों की बात |
क्या राहुल गाँधी को यह लगता है की जनता कुछ नहीं जानती या फिर इन्हीं को कुछ नहीं मालूम ? आज भी इनके पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में वही पुराने कांग्रेसी लोग आते हैं जो राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के ज़माने से जुड़े हुए है | नए लोग कम ही आते हैं अगर आते भी है तो बस पार्टी में कोई पदाधिकारी बनने या फिर किसी पदाधिकारी के साथ भीड़ बनकर |
यूपी की जमीन पर राजनीति, दिल्ली से कभी नहीं हो सकती | वहां का राजनीतिक समीकरण और जनता का रुझान मीडिया के दलीलों से नहीं समझा जा सकता | उत्तर प्रदेश जीतने के लिए पहले वहां के लोंगों का दिल जीतना पड़ेगा | दिल्ली के युवा की तरह सिर्फ फ्री वाई-फाई के लिए सरकार नहीं बनाते यूपी के युवा , वहां के लोग एक उम्मीदों के लिए सरकार बनाते हैं की उनकी परेशानी दूर हो सके | बिजली मिले, किसानों को खाद- बीज और सस्ते क़र्ज़ मिले , चीनी मिल चालू हो , फसलों का समर्थन मूल्य मिले , युवा बेरोजगारों को रोजगार मिले, महिलाओं को चिकित्सीय सुविधा के साथ सम्मान मिले , बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले | लेकिन इतने वर्षों के आज़ादी के बाद यूपी में, बस कुछ-कुछ बदला है ,और वह भी समय की देन है | सरकार तो कितनी बनी लेकिन समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी रहीं | स्वघोषित राजनेताओं ने राजनीती को विकास के चकरघिन्नी से निकाल कर जातिवाद की तरफ मोड़ ले गए | जातिगत समूहों को लगा की अब तो कुछ विकास होगा पर वहां भी छलावा ही रहा | कभी मंदिर तो कभी मस्जिद ... सब हो गया पर कोई ऐसा नहीं मिला जो उत्तर प्रदेश को उसकी हालत और हालात से बहार निकाल कर लोंगों के उम्मीदों को पंख दे सकें | हर बार नई उम्मीदों के साथ लोग सरकार चुनते है और बस ठगे जाते हैं |

राहुल गाँधी के नेतृत्व और बात में, यह कहीं नहीं झलकता की वहां की जनता उनसे कोई उम्मीद कर सकती है | बहुत सफ़र तय करना होगा राहुल जी को .... एक तरफ अखिलेश यादव एक युवा सीएम और अपने काम को लेकर जाने जाते है तो दूसरी तरफ मायावती भी अपने शासन से प्रभावित की हैं | बीजेपी की बैतरनी मोदी जी के सहारे है पर बिहार चुनाव को देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता | राहुल गाँधी के पास खुद को स्थापित और साबित करने का एक बेहतरीन मौका है लेकिन वह अपने पहले ही प्रयास में कुछ ख़ास नहीं कर पाए जबकि देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा भी पूरी हो गयी |  

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

चीन की चाल और भारत की नज़र

चीन की चाल और भारत की नज़र
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जब आप स्कूल में पढ़ते रहे होंगे तो आपके साथ कुछ ऐसे साथी भी पढ़ते रहे होंगे जो आपसे भी मीठा मीठा बात करते होंगे और आप जिनसे बात नहीं करना चाहते हैं उनसे भी वैसे ही बात करते रहे होंगे | दरअसल उनका मकसद यही होता है की दोनों को साधे रखें |
बिल्कुल उपरोक्त कथन की तरह चीन भी , भारत और पाकिस्तान के साथ वही कर रहा | इधर उसको बड़ा बाज़ार चाहिए उधर उसको भारत पर अपनी पकड़ बनाने के लिए पाकिस्तान का साथ चाहिए क्योंकी भारत का मुख्य सहयोगी अमेरिका बना हुआ है | चीन को अमेरिका से परेशानी है इसलिए सब कुछ बहुत ही व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जा रहा चीन द्वारा | अभी हाल में जब भारत ने पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल ऑपरेशन किया तो पाकिस्तान भाग कर चीन के पास गया और चीन ने ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोक दिया | यह सारा वाकया इसलिए हुआ क्योंकी कुछ दिन पहले भारत ने पाकिस्तान से जुड़े सिन्धु जल समझौते की समीक्षा करने की बात कही थी |
आज भारत के अन्य पड़ोसी देश नेपाल, बांग्ला देश आदि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के सुर में बात कर रहे जो सकारात्मक रुख है | इधर भारत भी विश्वसमुदाय को अपने पाले में करने के लिए और पाकिस्तान को सभी विश्व संगठन से अलग थलग करने की मुहीम चला रखी है | यह जरुरी भी है क्योंकी धीरे धीरे सभी देशों को यह पता चल ही गया है की पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है | आतंकवादी देश घोषित करने के लिए नैतिक दबाव बनाना जरुरी है |
भारत  की संप्रभुता और अखंडता से कोई भी देश, व्यक्ति या संस्था खिलवाड़ नहीं कर सकती | आज भारत के पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जिसकी इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है और वह देश को एक नई दिशा देने में लगे हुए हैं | बहुत कम समय में ही भारत की पहचान पुरे विश्व में एक शक्ति के रूप में हो रही है , अमेरिका भी इस बात को समझ रहा है इसलिए दोस्ती के सम्बन्ध को दोनों देश के राजनयिक मजबूत करने में लगे हैं | भारत किसी भी देश का अहित नहीं चाहता और सभी देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है और भूख, गरीबी , पर्यावरण जैसी गंभीर समस्याओं से लड़ना चाहता है | भारत सत्य, अहिंसा का देश है , यहाँ विभिन्न संस्कृति और विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं और भारत को एक लोकतान्त्रिक देश के रूप में सुसज्जित करते हैं |

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

भारत के विकास में रोड़ा अटकाने की कोशिश

भारत के विकास में रोड़ा अटकाने की कोशिश
Source:Google 

भारत और पाकिस्तान के बढ़ते गतिरोध ने अंततः भारत को सर्जिकल हमले के लिए मजबूर कर दिया | अभी एक दिन पहले भारत द्वारा सार्क सम्मलेन में भाग ना लेने की घोषणा को पाकिस्तान को विश्व समुदाय से अलग-थलग करने के नज़र से देखा जा रहा है |
नियंत्रण रेखा के पार जाकर भारतीय सैनिकों ने आतंकी शिविरों पर कार्यवाही की | पिछले कई दिनों से बहुत तनाव की स्थिति बनी थी | पाकिस्तान के आतंकवादियों द्वारा भारतीय सेना के 18 लोंगों को सोते वक्त मार दिया गया, आखिर कोई भी संप्रभु राष्ट्र इसे कब तक सहेगा ??
भारत जहाँ अपने विकास की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ रहा है , देश को विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा करने के लिए मेनहत कर रहा वहीं पाकिस्तान आतंकियों को संरक्षण देकर और भारत पर हमला करवाकर, कश्मीर की अवाम को गुमराह करके एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है | आज विश्व समुदाय इस बात को समझ रहा है की पाकिस्तान जैसा राष्ट्र अपने विकास पर ध्यान न देकर सिर्फ आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है | वर्तमान समय में चीन , पाकिस्तान का प्रमुख शुभचिंतक बना हुआ है वह भी सिर्फ इसलिए की शक्ति संतुलन कर सके ( भारत और अमेरिका सम्बन्ध को देखते हुए ) और अपनी व्यापारिक लाभ प्राप्त कर सके |
भारत हमेशा से शांति और दोस्ती को आगे बढ़ाने की बात करता आया है लेकिन सीमा पार से सिर्फ आतंकियों को भेजा जाता रहा है | खुद पाकिस्तान इस मसले को नहीं सुलझाना चाहता है | कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है यह जानते हुए भी उसकी कल्पना करना गुनाह है, यह बात पाकिस्तान को समझना चाहिए | पाक अधिकृत कश्मीर और बलोस्चिस्तान में पाक के मानवाधिकार हनन की बातें जिस तरह बाहर आ रही है ,इस तरह तो पाकिस्तान को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए |

मेरा व्यक्तिगत विचार है की पाकिस्तान , भारत के विकास को देखते हुए जलन महसूस कर रहा है और इसीलिए वह उसके रास्ते में रुकावट पैदा करने के लिए तरह तरह के युद्ध उन्मादी कार्य कर रहा है | इतिहास गवाह रहा है की युद्ध कुछ भी नहीं देता शिवाय नुकसान के और पाकिस्तान भारत के लिए यही चाहता है की जब भारत उसके स्तर तक गिर जायेगा तो वह इसी गतिविधि में उलझा रहेगा | लेकिन उसे यह समझना चाहिए की भारत उससे बहुत आगे निकल चुका है और यहाँ के बुद्धिजीवी और नेतृत्व चाहे वह जिस पार्टी से हों आगे ही ले जायेंगे | भारत की सोच, दृष्टि और उद्देश्य स्पष्ट है |

बुधवार, 28 सितंबर 2016

राहुल गाँधी और उनकी वर्तमान राजनीतिक यात्रा


राहुल गाँधी और उनकी वर्तमान राजनीतिक यात्रा

source: Google 

राहुल गाँधी, एक ऐसे युवा नेता हैं जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है | उन्हें पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत संघर्ष नहीं करना पड़ा है परन्तु आज भारतीय राजनीति में उनकी सहभागिता लोंगों को समझ नहीं आती | एक युवा होने के नाते जितना आक्रामक उन्हें होना चाहिए वो नहीं हैं | जहाँ भारत का संविधान विपक्ष की राजनीति को भी सम्मान देता है वहां विपक्ष इतना कमजोर है की किसी भी मुद्दे पर बहस करने की बजाय सदन से बाहर भागने की जल्दी होती है |
आज-कल राहुल गाँधी, उत्तर प्रदेश में खाट यात्रा कर रहें हैं | आम आदमी, किसान ,जवान  सबसे मिलने निकले हैं | जब खुद को ख़ास समझ लेंगे तो फिर आम आदमी से कैसे मिलेंगे ???? फोटो देखकर यही सोच रहा था |
सत्ता से बाहर हैं तो सबकी कितनी चिंता है इनको | चुनावी रैली छोड़कर राहुल गाँधी कितनी बार देवरिया गए हैं ? कितनी बार लखीमपुर गए या फिर कितनी बार देश के उन पिछड़े इलाकों में गए जहाँ लोग जीवन के मुलभूत चीजों के लिए परेशान हैं ??
जब चुनाव आता हैं तो गरीबों और किसानों का दर्द महसूस होने लगता हैं | सत्ता में बैठ कर कुछ नहीं दिखाई देता | जिस देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है वहां का कृषक जीवन जीने के लिए संघर्ष करता हैं बाकि सुविधाएं तो सिर्फ सपना है |
आज राहुल जी यात्रा कर रहे हैं , उनका कोई स्पष्ट नीति नहीं है की वह लोंगों को बता सकें शिवाय इसके की मोदी सरकार गरीबों और किसानों के लिए क्या कर रही है, जान ले रही है , मार रही है, वो तो पूरा विश्व भ्रमण कर रहें है फला फला फला .... | कांग्रेस ने 50 साल से ज्यादा शासन किये सत्ता की चासनी में डूब डूब के नहाये फिर भी गरीबी भुखमरी दूर नहीं कर पाए और आज आप , आपकी पार्टी सवाल कर रहे हैं | जिस दिन आप जैसे राजनीतिक परिवार के बच्चे जमीन से जुड़ कर आम लोंगों के साथ संघर्ष कर पार्टी लाइन में आगे आयेंगे तब आम लोंगों का दर्द महसूस होगा |

होता है राहुल जी , जब अपने मुहं में निवाला जाता रहता है और किसी चीज की कमी नहीं होती तो ऐसा लगता है की सब लोग तो खुश ही है , सबका पेट भरा ही है |

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...