मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बाबाओं का पीआर

बाबाओं का पीआर 



अनेक बुद्धिजीवी बाबाओं को गरीयाने का अपना कर्तव्य मान बैठे हैंलेकिन यह भूल जाते हैं की बाबाओं के पास बहुत सारे जुगाड़ है, जिसे आप मॉडर्न भाषा में पीआर कह सकते हैं | भारत की जनता हमेशा से संतोंभिक्षुओंसूफ़ियोंका देश रहा है | ऋषियों की परम्परा बहुत पुरानी रही है | बुद्धशंकराचार्यगांधीबिनोबा भावेजयप्रकाश नारायण,  हर काल-चक्र में भारत की जनता इस तरह के लोगों को सुनती रही है जो नेता बनने का ढोंग नहींबल्कि संत-सन्यासी दिखते हों |( आज के दौर की विकृत परिभाषा से अलग जिसमें खुद बाबाओं का भी योगदान है)

बाबा लोंगों के ख़िलाफ़ ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैंसवाल किसी के खिलाफ उठाये जा सकते हैं लोकतंत्र में यह होना भी चाहिए | भारत जैसे विविधता वाले देश में, गुरू परम्परा होने की वजह से बाबा लोंगों की पुछ हमेशा बरक़रार रहेगी शायद इसे चुनौती भी दिया जाये, तो पत्थर पर सिर मारने वाली बात होगी |
पहले बाबा लोग दुनियादारी से दूर एकांतवाश में भजन-कीर्तन करते हुए आम जनता को अच्छी बातों का प्रवचन देकर अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते थे | (आज के दौर में भी ऐसे कुछ लोग मिल सकते हैं) परन्तु टीवी के बढ़ते प्रभाव ने जैसे इनके सेक्टर में भी बूम ला दिया और उसका साथ दिया इन्टरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने | तरह-तरह के चैनलों के माध्यम से यह बाबा लोग धीरे धीरे लोंगों के घर के अन्दर तक पहुंचें और आज इनके आश्रमों द्वारा बनाये गए जैविक खाद्य पदार्थ लोंगो के रसोई और दैनिक जीवन का हिस्सा बन रहे हैं | ऑनलाइन स्टोर से लेकर रिटेलशॉप तक खुल गए हैं | दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली लगभग प्रत्येक खाद्य सामग्री इन बाबाओं के कम्पनी रूपी आश्रम में बनायीं जा रही हैं,  और स्वदेशी के नाम पर बेची जा रही है |
यह बाबा लोंगों का पीआर ही है जो यह संभव बना रहा है | बिना किसी पीआर एजेंसी को हायर किये और न ही विशेष विज्ञापन द्वारा, खुद से ही ऐसा जनतंत्र खड़ा कर दिए हैं की उनकी कोई खिलाफत करे तो आस-पास के लोग आपत्ति करने लगते हैं | और शायद मार-पिट पर भी उतारू हो सकते हैं | पीआर का ऐसा नमूना शायद ही देखने को मिले | बाबाओं का पीआर एक चरणबध्द पीआर का उदहारण है जिससे हम लॉन्गटर्म पीआर और उसके प्रभाव को सीख सकते है, और व्यवसाय के हिसाब से एडिट करके उपयोग में भी ला सकते हैं |



- विन्ध्या सिंह 

स्किल इंडिया और बेरोजगारी

स्किल इंडिया और बेरोजगारी
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स्किल इंडिया का नारा आज हर जगह सुनने को मिल जाता है | स्किल का विकास हो न हो लेकिन नेताओं की फोटो पेपर में जरुर छप जाती है , शायद उन्हें बस इतने से ही मतलब है | गाँव की भाषा में इसे कोरम पूरा करना कहते हैं , मतलब किसी तरह जल्दी निपटाओ भाई और झूठे आकड़ें प्रस्तुत कर के खुद की पीठ थपथपा लो | हो गया स्किल इंडिया का वादा पूरा |
70 साल हो गए आज़ादी के , बेतहाशा जनसँख्या भी बढ़ ही रही है  , उसी के साथ- साथ  बेरोज़गारी भी दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है | इसमें स्किल इंडिया का नारा तो अँधेरे में एक रोशनी जैसा है | क्योंकी आज किसी भी क्षेत्र में नौकरी खोजने जाईये तो अप्रशिक्षित लोंगों की जगह प्रशिक्षित लोंगों की ज्यादा मांग है | इसलिए स्किल इंडिया, एक अवसर के तौर पर देखा जा सकता है |  खैर , सरकार तो भरसक यह कोशिश कर रही है की स्किल इंडिया के माध्यम से बेरोजगारों को प्रशिक्षण दे कर उन्हें उचित रोजगार मुहैया काराया जाये | इस मिशन से ख़ास तौर पर गरीबों और उन छात्रों को फायदा होगा जो आर्थिक स्थिति की वजह से तकनिकी पढ़ाई नहीं कर पाते और मजबूरन अकुशल कामगार की तरह कार्य करना पड़ता है |

स्किल डेवलपमेंट के मामले में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत बहुत पीछे हैं। चीन में 45 फीसदी, अमेरिका में 56 फीसदी, जर्मनी में 74 फीसदी, जापान में 80 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी लोग किसी न किसी कौशल में प्रशिक्षित हैं, जबकि भारत में यह संख्या 4 फीसदी से भी कम है। पहली बार उन युवाओं के बारे में सोचा जा रहा है जिनकी औपचारिक शिक्षा किन्हीं वजहों से छूट गई थी | अगर स्किल इंडिया का यह विचार सफल होता है तो भारत एक बार फिर सम्पूर्ण विश्व में एक अलग मुकाम बनाने में सफल होगा |

सोमवार, 29 अगस्त 2016

पृथ्वी में कई पृथ्वी

पृथ्वी में कई पृथ्वी


Photo:Google
इंसान के विकास के इतिहास की कहानी तो आप सभी लोग जानते ही है, तो आप सभी ये भी जानते होंगे की इन्सान एक ऐसी प्रजाति है जो “जिसमें है उसको छोड़ भविष्य में खुशियाँ खोजता है” | ब्रह्मा के रचनात्मकता का अंत है मानव, और मानव उसी रचना को अपने तरीके से रच के ब्रह्म बनने की कोशिश में लगा हुआ है | आप सब सोच रहे होंगे की मै रचना, ब्रह्मा , मानव इन सबको एक साथ क्यों जोड़ रहा हूँ तो मै आपको इस माध्यम से आपके आस पास ही ले चलता हूँ ..
एक पृथ्वी , जिसमें कई तरह मौसम हैं, कई तरह के जीव जंतु , पेड़ पौधे है , बारिश है हरियाली है , लोग है , रिश्ते है , भावनात्मकता है, खुशियाँ है , सब कुछ है जो एक इन्सान की जरुरत है परन्तु इन्सान की जरूरतें पूरी कब होती है ? यह ऐसा प्रश्न है जो यक्ष, युधिष्ठिर से पूछना भूल गया था शायद |
आज जिस तरह मनुष्यों ने संयुक्त परिवार को छोड़ कर न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) की अवधारणा विकसित कर लिया है वैसे ही न्यूक्लियर पृथ्वी का भी सफल प्रयोग करने लगा है| हो सकता हो की अलग अलग दिमाग के लोंगो के लिए अलग अलग फायदे नज़र आये पर एक पृथ्वी में कई पृथ्वी बनाए जाने पर सबका दिमाग देर सवेर एक ही बात सोचेगा की क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं ?
गर्मी बढ़ रही है , क्यों बढ़ रही है ? क्या आपने कभी अपने स्वार्थ अपने भौतिक सुख से परे हट के दो मिनट के लिए सोचा है ? सोचिये ... !
श्रीमान ! यह हम सभी मानव की वजह से ही बढ़ रही है | ये जो मौसम की मार झेल रहे है न यह बस हम मानव के बेहतरीन सुख पाने के चक्कर में ही झेल रहे है | एक पृथ्वी जो सब कुछ देती है हवा, पानी, भोजन , इत्यादि | सबको बराबर देती है क्योकि सबका बराबर हक भी है,  परन्तु मानव स्वभाव है की सब कुछ मेरे पास हो, इसके चक्कर में जिनके पास नहीं है वो उनके स्वार्थ की मार झेल रहे है | आज कुछ लोगों के घर में एसी है , उनके कार में, ऑफिस में हर जगह | अपनी एक छोटी सी पृथ्वी लिए हर जगह घूम रहे है , जी रहे है | उनको तो अच्छा लग रहा है पर उससे निकलने वाली गर्मी से कौन परेसान है ? मानव ही न |मानव ही मानव का दुश्मन बना हुआ है | एक ऐसा युद्ध जिसमें कोई हथियार नहीं है बस अपना-अपना स्वार्थ है और वही कालचक्र बन गया है |
लातूर से लेकर बुंदेलखंड तक पानी नहीं है , गर्मी में और भी जगह के नल सूखते ही जा रहे , रोज़ वायु प्रदुषण का रोना रोयेंगे परन्तु वो सब कुछ करेंगे जो आज की समस्या का कारण है | प्रदुषण के कारण मौसम भी बदमिजाज़ हो ही गया है और यह बदमिज़ाजी सिर्फ बढती ही जा रही है | आप अभी उतराखंड के दावानल को देखिये और तो और बढ़ते हुए कश्मीर तक पहुच गया |
जो पृथ्वी देती रही है वो हर मौसम अब मानव को एकल रूप में चाहिए | अपनी दुनिया अपनी पृथ्वी जहाँ हर मौसम का आभास मात्र हो , अपनी छोटी सी पृथ्वी | भले प्राणवायु (ऑक्सीजन) खरीदना पड़े , पानी तो बिक ही रहा है | डार्विन के जीवन का सिध्दांत ( वही जिराफ़ वाली ) – ‘जिसकी पहुँच उसकी जिंदगी’ | खुद ही आसान सी जिंदगी को एक रेस में बदल दिए है हम सब |
लोग अपने आप में ही मशगुल हो गए है और सिमटते जा रहें है, अपने बनाये छोटे छोटे पृथ्वी में, पर कोई इस एक पृथ्वी के लिए नहीं सोच रहा है| अगर यही नहीं रहेगी तो मानव जो रचनाकार बना खुद में मंत्रमुग्ध है , खुद ही विलुप्त हो जायेगा |
हे मानव ! बचा सकते हो तो अपने स्वार्थ को छोड़ कर इस धरा को बचा लो |


-    विन्ध्या सिंह 


छूटती भाषा, टूटता समाज

छूटती भाषा, टूटता समाज


 Photo:Google
आज पूरी दुनिया कुछ बेहतर पाने के लिए अपनी महत्वपूर्ण चीजों को पीछे छोड़ती जा रही हैं। कुछ चीजें छूटकर विलुप्त भी हो रही हैं। हम किसी वन्य जीव या सामान की बात नहीं कर रहे। हम बात कर रहे हैं, भाषा की। भाषा मतलब अभिव्यक्ति का सबसे सुगम माध्यम। दुनिया में करोड़ो भाषाएं बोली जाती हैं। कुछ भाषाओँ का प्रयोग अधिक होने के कारण सुरक्षित अवस्था में हैवहीँ कम प्रयोग में लायी जाने वाली भाषाएँ विलुप्त होती भाषाएं हैं, जिनका प्रयोग समाजिक और वैश्विक सोच के कारण कम हो रहा है , वह लगभग क्षेत्रीय स्तर की हैं।
गांवों से पलायन कर शहर की तरफ भागना और शहरों की बढ़ती आबादीभाषा की कठिनाईबहुत सी प्राकृतिक आपदाएं आदि ऐसे कई कारण हैं जिससे भाषाएं विलुप्त होती गयी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही भाषा की उपेक्षा के कारण भी कई आंचलिक व लोक भाषाएं दम तोड़ रही हैं । स्कूल, कॉलेज हर जगह अपनी मूल भाषा से कट कर शिक्षा दी जा रही है, अब जो बच्चा अपनी भाषा को सीखेगा ही नहीं , तो वह अपनी भाषा से कट नहीं जाएगा ? इसका परिणाम यह होता है की क्षेत्रीय भाषा धीरे धीरे दम तोड़ देती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के रिपोर्ट के अनुसारवर्ष 2021 तक 96 प्रतिशत भाषाएं और लिपियां ख़त्म हो जाएंगी। इस प्रकार सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि उससे जुड़ी प्रकृति,इतिहास, रहस्यजीवन शैलीसंस्कृति आदि भी विलुप्त हो जाती है। वर्तमान समय में संस्कृति भाषा भी इस ओर बढ़ रही हैक्योंकि अब संस्कृत भाषा बोलचाल के लिए प्रयोग में नहीं लायी जा रही है । देश में पालीप्राकृत सहित कई भाषाओं ने अपना अस्तित्व खो दिया । सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि अभी तक नहीं पढ़ी जा सकीजिससे बहुत सी जानकारियां मिल सकती हैं। क्षेत्रीयराष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हजारों भाषाएं विलुप्त हो गयी या विलुप्त होने वाली हैं।
ऐसा कहा जाता है कि भाषा विचार व्यक्त करने का एक माध्यम है जिसे सहज पूर्वक प्रयोग में लाया जाता है | जनसम्पर्क और जनसंचार के लिए भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा विचारों को फैलाया और आगे बढ़ाया जा सकता है | भारत का इतिहास बहुत समृद्धशाली रहा है जहाँ अनेक ऋषि मुनि और तपस्वियों ने अपने अनुभव को भाषा के माध्यम से लोंगों के साथ साझा किया और सामाजिक समरसता के साथ-साथ लोंगों के जीवन में बदलाव लाये |
भाषा के पुनरुथान के लिए हम सबको आगे आना चाहिए और अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए |
दूसरों को देख कर या नक़ल कर अपनी भाषा को कमजोर और पिछड़ा नहीं समझना चाहिए , तभी भाषा को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है और देश की एकता के साथ साथ इसके बहुरंगी समाज को विकास के पथ पर आगे ले जाया जा सकता है |  लुप्त हो रही भाषाओं के वजह से ही देश-दुनिया में सामाजिक प्रभुत्व टूटता जा रहा है। भाषा संरक्षण के लिए वैचारिक पहल की बहुत अधिक जरुरत है।

-    विन्ध्या सिंह 


राष्ट्रीय खेल दिवस और प्रतिभाएं

राष्ट्रीय खेल दिवस और प्रतिभाएं

फोटो: गूगल
दुनिया भर में ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से मशहूर खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद जी के जयंती के रूप में हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है | उनके प्रति भारत की जनता का सम्मान है |
हम आज के दिन  राष्ट्रीय खेल नीति के बारे में ध्यान दिलाना चाहते हैं – आपको याद होगा जब आपके बचपन में बहुत सी ऐसी प्रतिभाएं थीं , वही राजू  जो बहुत तेज़ दौड़ता था , अरे ! साधना, जो सबसे ज्यादा ऊँचा खुदती थी , आपको याद नहीं जियाउल अली जो कबड्डी में सांसें कितने लम्बी देर तक रोक लेता था या वो नुपुर निषाद जो सबसे लम्बा भाला  फेंकती थी | ऐसे लोग किसी भी खेल स्पर्धा में स्कूल या कालेज स्तर पर पदक जीतते थे | गाँव हो या शहर , हर जगह ऐसी प्रतिभाएं मिलती रहीं है जो बदस्तूर अब तक जारी है बिना किसी सहयोग के | कुछ प्रतिभाएं घर के अभिभावक के जागरूकता के कारण आगे बढ़ कर साक्षी ,सिन्धु ,जीतू और करमाकर बन जाती हैं तो कोई फटेहाल जिंदगी को सिलने में लग जाती हैं | ऐसी है हमारे देश की खेल नीति , जो 70 सालों में गाँव तो छोड़िये , शहर तक नहीं पहुँच पायी |
क्यों पदक की आश लिए हैं हम सभी ?? जब उन प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दे रहे | तरह तरह के खेल स्पर्धा के लिए समिति बनी हुई है और उस समिति में खेल से जुड़े लोग बस ढूंढने से ही मिलेंगे | मिलेंगे तो किसी नेता, किसी बिजनस मैन के रिश्तेदार या खुद नेता ही घाघ बन के वर्षो से खेल को आगे बढ़ा रहें है, तथा मीडिया में हल्ला मचा के पदक की उम्मीद लगाये बैठे हैं | हो भी क्यों न ! कम से कम पुरे ओलंपिक सत्र के दौरान टीवी पर दिखने का मौका जो मिलता है उनको |
कितनी दोहरी सोच है , खेल भावना जगती भी है तो बस ओलंपिक में पदक लाने के लिए | उसके पीछे की व्यवस्था और सहयोग को हम सोचते तक नहीं | एक खिलाड़ी जो बिना किसी सहयोग के , बहुत सी उपेक्षाओं को झेलते हुए भारत के अपेक्षाओं पर खड़ा उतरने की कोशिश करता है और हम टीवी ,न्यूज़ पेपर देख और पढ़ के बस कोसते और ताली बजाते हैं |
कब जागेगी सरकार और कब जागेंगे लोग , बहुत से साक्षी, सिन्धु , करमाकर, जीतू , बाबर गाँव –गिरांव और शहरों में अपने देश के लिए पदक जितना चाहते हैं , लेकिन उनके सामने जिंदगी जीने की जद्दोजहत भी है जो उनके खेल पर भरी पड़ जाती है |

अब सरकार के साथ ही आम जनमानस को भी इसके विषय में सोचना होगा , तभी हम सब देश के नाम को पदक तालिका में सबसे ऊपर देख पाएंगे |

शनिवार, 27 अगस्त 2016

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

हीरो बनाना हो या जीरो, सोशल साइट्स है ना

photo: google
वर्तमान समय में विभिन्न सोशल साइट्स और इन्टरनेट ने पुरे विश्व को ग्लोबल विलेज बना दिया है | अमेरिका या तुर्की में कोई घटना घटती है तो, चंद सेकंड में पुरे विश्व के लोग जान जाते है | इसके उपयोग से आभासी दुनियां में लोंगों के बीच बहुत अधिक जुड़ाव हुआ है , वास्तविक दुनियां में कितना है यह एक वक्तव्य से साफ़ है  “एक आदमी के फेसबुक पर 3000 मित्र थे, ट्विटर पर 850 लोग जुड़े थे , लेकिन जब उसकी तबियत ख़राब हुई तब उसके पास और साथ सिर्फ उसकी माँ ,पिता जी और पत्नी ही थे |
खैर यह व्यक्तिगत बात है , परन्तु मिस्र का आन्दोलन और भारत में हर चिंगारी का पुरे देश में फ़ैल जाना सोशल साइट्स के ही उदहारण है, जो व्यक्तिगत से व्यापक हैं |
हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं , राजनितिक औजार के रूप में सोशल साइट्स का उपयोग |
पिछले एक वर्ष में भारतीय राजनीति के अखाड़े में देश के नेताओं के लिए सोशल साइट्स बेहद तेज़ और अचूक औजार साबित हुआ है | हालांकि, इसकी शुरुआत 3 साल पूर्व भ्रष्टाचार के विरोध में उपजे अन्ना जी के आंदोलन से हुई थी | जिसमें चंद सेकंड में अनगिनत लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने में भरपूर उपयोग हुआ | इससे प्रभावित होकर राजनितिक गलियारे में भी विभिन्न सोशल साइट्स जैसे फेसबुक और ट्वीटर इत्यादि को अपनाना पड़ा |
जी हाँ , अगर हम भारतीय सन्दर्भ में देखें तो इसका प्रयोग वर्तमान सरकार में बहुत बड़े रूप में किया गया | एक व्यक्ति को ऐसा दिखाया गया की वही हर्क्युलिश है, और वास्तव में लोंगों ने मान भी लिया | इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे सत्ता विरोधी लहर , पिछली सरकार की नाकामी इत्यादि | परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की मीडिया के साथ सोशल मीडिया (सोशल साइट्स) का हाथ नहीं था, एक ऐसी लहर बनाने में जिससे प्रचंड बहुमत मिल गया और सरकार भी बन गयी |
आज सोशल साइट्स का इतना उपयोग है की, मुख्य मीडिया (टीवी, प्रिंट, रेडियो) भी पीछे हैं | किसी को हीरो बनाना हो या जीरो , बस सोशल साइट्स पर पेज बनाईये और जुट जाइये उसे टैग करने, फ़ैलाने में | सौ बार झूठ पढ़ने के बाद इंसान सच ही मानेगा | (ऐसी कहावत है- सौ बार झूठ बोलने पर, लोग सच ही मानने लगते हैं)

-    विन्ध्या सिंह 

गाँव और गुडगाँव

गाँव और गुडगाँव
फोटो : google

कहने को तो हम चाँद और मंगल पर पहुँच गए है, पर अभी भी हम मुलभूत समस्याओं से ही घिरे हैं, और आने वाले भविष्य में भी इसका सामाधान नहीं दिखता | देश को आजाद हुए 70 साल हो गए परन्तु अभी मिलेनियम सिटी कहे जाने वाले शहरों में ही ग्रामीण टाइप की समस्यायें विद्यमान है | महंगाई और बिजली का रोना तो रोज़ रोज़ का झंझट है ही | लेकिन साल भर में कुछ ही दिन बारिश होती है, उससे होने वाली परेशानियों से भी आज तक निज़ात नहीं मिल पाई |
गाँव में थे, तो बारिश आने पर यही सोचते थे की काश! शहर जैसी सड़क यहाँ भी होती तो आराम से खेत और चौराहे तक जा पाते | सड़कों पर थोड़ा कचड़ा होता था, क्योकिं सड़कें कच्ची थीं ( अब तो प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से मुख्य सड़कें पक्की हो गयी हैं ) | गाँव में पानी के निकासी की भी कोई समस्या नहीं हैं ( कुछ गाँव में रंजिश के कारण समस्याएं हैं |) , पानी आस-पास के गड्डों में इकठ्ठा हो जाता है | उस टाइम पर, बारिश के समय शहर को सोच-सोच अच्छा लगता था| लेकिन यहाँ गुडगाँव में (जो देश की मिलेनियम सिटी और आईटी सिटी के नाम से जाना जाता है ) थोड़ी सी ही बारिश में जिस तरह हर जगह पानी जमा हो जा रहा , सड़कें टूट जा रहीं और घंटों घंटों जाम लग जा रहा है , इसे देखकर तो यही लगता है की गाँव ही ठीक है क्या अंतर है गाँव और गुडगाँव में |
बेतरतीब तरीके से किया गया डेवलपमेंट, जहाँ ऊँचीं ऊँचीं गगनचुम्बी इमारतें खड़ी हैं , शीशे चमक रहे हैं, वहीँ नीचे सड़कों पर लोग पानी में अपनी-अपनी गाड़ियों और शरीर को लेकर नुरा-कुश्ती खेल रहे हैं | सड़कों पर लोग खड़े होकर यह सोच रहे हैं की पानी के दरिया को कैसे पार करूँ | हालत यह है की घंटो जाम से लोग परेशान हैं |
विकास की अंधी दौड़ में भागने पर, यही सब मूलभूत समस्याएँ दिखती नहीं, पर आगे परेशान बहुत करती हैं | और इसे गुडगाँव के लोग या देश के ऐसे किसी भी शहर के लोग जो बारिश के पानी से तबाह हैं, महसूस कर सकते हैं |
अब भारत में सिर्फ प्राकृतिक बाढ़ ही नहीं इंसानों द्वारा कृत्रिम तरीके से भी बाढ़ लाने की क्षमता है जिसका दोहन वह हर बारिश के मौसम में कर रहा है | मीडिया भी समय आने पर अपने काम की इतिश्री कर लेती है, और सरकारें भी बरसाती मेढक की तरह इलेक्ट्रोनिक चैनलों में टर्र-टर्र करके मौसम की तरह  बदल लेती हैं |
भाई ! चाँद और मंगल पर बाढ़ आये तो समझ लेना इंसान वहां रहने के लिए पहुँच गया है......

-विन्ध्या 

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...