बुधवार, 3 जुलाई 2024

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

 

आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्त्र के लिए वोट डाला ? जहां आरोप प्रत्यारोप ही लगाए जाते हैं और देशहित, समाजहित की कोई बात नहीं होती। 


आखिर चुनाव हो गए, सरकार बन गयी तो संसद में बहस सकारात्मक होनी चाहिए। किसने चुनाव में क्या बोला, हिन्दू मुसलमान, आरक्षण, संविधान के अलावां बेरोजगारी, सरकारी संस्थाओं में नौकरी की बजाए थर्ड पार्टी कांट्रैक्ट कर सिर्फ पीएफ अकाउंट दिखा कर रोजगार की गिनती करवाना, परीक्षा में सेंधमारी इत्यादि मुद्दा ही नहीं है। 

महंगाई ऐसा मुद्दा है जो आम जन जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है उसकी कोई जिक्र नहीं। कुछ सांसद तो ऐसे हैं जो यही बताने में लगे हैं कि हम 30 साल से सांसद है। भाई आप 30 साल से सांसद है या 50 साल से, आपके क्षेत्र में कितना विकास हुआ ? जिस क्षेत्र से सांसद है उस क्षेत्र का इतना विकास तो हो जाना चाहिए की वह अन्य लोगों के लिए मॉडल बन जाए। पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि आपका फोकस सिर्फ सांसद बनना ही रहा चाहे इस पार्टी से या उस पार्टी से जैसे भी, और जनता को ठगना था। जब चुनाव होता है तो मतदाता भगवान हो जाता है और सभी लोग मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह तरह के जतन करते हैं। जब चुनाव के परिणाम आ जाते हैं तो मतदाता की समस्या कोई समस्या नहीं होती। 

संसद राष्ट्रीय, सामाजिक और अन्य क्षेत्रों की समस्याओं को सुनने और उसका हल निकालने के लिए बातचीत करने की जगह है जहां पक्ष विपक्ष चर्चा करता है कि उस मुद्दे का क्या सोल्यूशंस है और उसका प्रभाव क्या है। जनता से जुड़े मुद्दे जनता को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन यहाँ व्यक्तिगत आरोप और बहस होने लगता है जिसमें सरकार बनाने-बिगाड़ने और पुरानी बातों को खोदकर निकालने की बात ही होती है। 


पक्ष विपक्ष की राजनीति में आम जनता का दर्द भूल गए हैं प्रतिनिधि। लोगों को अपने क्षेत्र से ज्यादा चिंता मीडिया में बने रहने, जोड़ तोड़ की राजनीति में अवसर तलाशने तक ही रह गयी है। 

लोकतन्त्र, लोक और लोग से बनता है और यदि वही खोखला होने लगे तो खतरा ज्यादा है क्योंकि समाज और देश की मजबूती सबसे पहले है और देश की सुरक्षा और आर्थिक विकास देश की मजबूती के लिए जरूरी है। यह तब होगा जब आम इंसान खुशहाल होगा। 

( Image Source : Sansad TV )

मंगलवार, 15 जून 2021

#पॉलिटिकल_मानसून : बंगाल की खाड़ी का राजनीतिक मानसून यूपी और बिहार पहुँच गया है !

बिहार में ‘चिराग’ जल रहा है, और यूपी का 'हाथ' कमल पकड़ रहा है, तो हाथी वाले साथी अपनी राजनीतिक रफ़्तार बढ़ाने के लिए साइकिल की सवारी करने के जुगाड़ में हैं।

खेला होबे- खेला होबे करते-करते ममता दीदी बंगाल में सरकार क्या बनायीं, यूपी और बिहार में पार्टी तोड़ने-जोड़ने का कार्यक्रम चलने लगा। बंगाल में टीएमसी छोड़ बेटे संग भाजपा में आये मुकुल रॉय विधानसभा चुनाव के बाद वापस पुराने घर टीएमसी में चले गए। और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता जितिन प्रसाद, जो राहुल गाँधी ब्रिगेड के माने जाते थे और उनके करीबी नेताओं और सिपहसालार में शुमार थे कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी का दामन थाम लिये। तो वहीं बिहार की एक क्षेत्रीय और पारिवारिक पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी, जो राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए अपनी साख ही दांव पर लगा बैठी थी, में ऐसी फूट पड़ी की भतीजे की अध्यक्षता वाली पार्टी को चाचा ने ही तोड़ दिया। मामला इमोशन और महत्वाकांक्षा का था तो राजनीतिक चुहलबाजी तो होनी ही थी। वैसे भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में कहीं कोई हलचल होती है, तो उसकी आवाज़ दिल्ली तक सुनाई देती है। इस पार्टी के संस्थापक दिवंगत नेता रामविलास पासवान थे जिन्हें 'मौसम विज्ञानी' कहा जाता था। राजनीतिक परिस्थिति भांपते हुए वह किसी भी पार्टी में सट के कम से कम मंत्री तो बन ही जाते थे। यह गुण शायद बेटे में नहीं आया और वह सीधे-सीधे राजनीतिक पुरोधाओं को चुनौती देने लगे, तो फिर उसका खामियाज़ा भी तो भुगतना पड़ेगा। इसलिए अभी मामला लाइमलाइट में चल रहा ह
ऐसी ही एक घटना कुछ वर्ष पहले उत्तर-प्रदेश में भी हुयी थी पर यहाँ भतीजा 'जबर' मना गया, और उसने चाचा को ही पार्टी से दूर करने का प्रबंध कर दिया। लेकिन बिहार में चाचा चंठई कर दिए और चिराग पासवान की पार्टी ही उनके नीचे से दरक गयी।
अभी उत्तर-प्रदेश में एक और मामला देखने-सुनने को मिल रहा है जिसमें मायावती की पार्टी-बसपा के कुछ विधायक एक गुट बना कर अपनी पार्टी से अलग होने की फ़िराक में हैं, और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के संपर्क में हैं। मतलब समझ ही सकते हैं जो राजनीतिक मानसून बंगाल की खाड़ी से उठा वह पूर्वी विक्षोभ के सहारे उत्तर-प्रदेश तक पहुँच गया है। इस पार्टीतोड़वा टाइप काम से कोई दल फूला नहीं समा रहा होगा।
पश्चिमी विक्षोभ भी हिलोरे मार रहा है और अरब सागर की ओर से जल्द ही राजनीतिक मानसून उठने की सुगबुगाहट हो रही है। खबरें उड़ रही हैं, देखिये आगे कितनी सत्य होती हैं। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, शरद पवार से मिलकर क्षेत्रीय दलों के माध्यम से केंद्र सरकार के खिलाफ एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करने की जुगत में हैं जिसमें ममता बनर्जी एक सशक्त नेता के रूप में अगुआई कर सकती हैं। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद वह एक आयरन लेडी के रूप में उभरी हैं, शायद इसलिए उन्हें मोदी के सामने एक मजबूत नेता के तौर पर देखा जा रहा है। ( उनके अलावा कहीं कोई दिख भी तो नहीं रहा है)
पश्चिमी विक्षोभ जब आगे बढ़ेगा तो राजस्थान और पंजाब में भी गरज-चमक के साथ थोड़ी बहुत आंधी-तूफ़ान आने की संभावना है। गहलोत सरकार से नाखुश और कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट भी कभी-कभी विरोध के सुर अलाप देते हैं। उनके सुर-ताल को देखते हुए, दिल्ली में समझाईस कार्यक्रम भी जोर पकड़ लेता है। पर देखना है की कब तक यह चक्र चलता है।

पंजाब में सिद्धू की एक अपनी अलग नुरा-कुश्ती चल रही है। जिसमें वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ नगाड़ा बजा रहे हैं। आपको तो ज्ञात ही होगा की वह बीजेपी से रूठ कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन उनके अनुसार वहां उनको हल्के में लिया जाने लगा है। अपना वजन बताने के लिए वह राजनीतिक कुश्ती के दांव आजमा सकते हैं।
कुल मिला-जुला के यही खेला है, की राजनीति में कोई किसी का नहीं होता भले बचपन में एक ही थाली में खाए हों या एक-दुसरे के कपड़े पहन कर जय-वीरू बनें हों। पॉवर, पद और महत्वाकांक्षा की लड़ाई में सब कुछ जायज ही ठहराया जाता है। राजनीति का मानसून कब कहाँ से चलेगा किसी को नहीं पता होता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे खूब तेज धूप में बारिश होने लगे, और आप टोटल कन्फ्यूजिया जाते हैं।
- विन्ध्या सिंह ( vindhya08@gmail.com) Twitter: vindhya08
(वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और बदलते मानसून को देखते हुए)

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

सुशांत सिंह राजपूत के सपने और देश का युवा

एक छोटे से शहर के हाईस्कूल में पढ़ने वाला लड़का जब रोज साइकिल से स्कूल और कोचिंग पढ़ने जाता है तो एक-एक पैडल के साथ वह अपने सपनों को जीने की और आगे बढ़ने का दम लगाता है | कुछ ऐसे सपने जो वह अपनी पारिवारिक स्थिति, अपने आस-पास और दोस्तों को देखते हुए, किसी आदर्श व्यक्तित्व या अन्य कहीं से प्रेरणा लेकर बुनता है और फिर अपने अंदर ही अंदर उसे पूरा करने के लिए जूझता है | कुछ ऐसे ही सुशांत भी थे | उन्हीं युवाओं के बीच से निकला एक युवा जो अपने सपनों को जीना चाहता था और वह कदम-दर-कदम आगे भी बढ़ रहा था | फिर अचानक वह दुनियां छोड़ कर चला गया | कैसे गया यह ठीक-ठीक कोई भी नहीं बता सकता ....

लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करने वाला इंसान, खुद से खुद को बनाने वाला इन्सान कभी ख़ुदकुशी जैसी सोच नहीं रखता है | उसको यह पता होता है की वह कर क्या रहा है और करना क्या है | अपनी मंजिल को देखने वाला इंसान बुरे और कठिन परिस्थितियों से नहीं घबराता | कठिन समय से निकलने के लिए रास्ते खोजता है पर वह रास्ता जीवन से इतिश्री का नहीं होता | क्योंकि वह जिंदादिल इंसान होता है उसे जीवन को जीने में मजा आता है और उसे उपर वाले पर भरोसा होता है | अपने आस पास आप ऐसे लोगों को देख सकते हैं ... आपको ऐसे इंसान मिल जायेंगे जिन्हें आप जिंदादिल कह सकें, जिन्हें आप यह कह सकें की- यार ! मस्त इंसान है |

चूँकि सुशांत हम लोगों जैसे युवाओं में से ही थे तो उनका संघर्ष, उनके काम, उनकी सोच, उनका व्यवहार अपने उम्र वर्ग के युवाओं जैसा ही रहा होगा | आज युवाओं में इसीलिए आक्रोश भी है की वह ऐसे कैसे जा सकते है जैसी स्टोरी चलायी जा रही है | जब छोटे शहर से निकला युवा अपने सपनों को लेकर दिल्ली, मुंबई, बंगलौर जैसे बड़े शहरों में आता है तो वह अपने जीने और व्यवहार का तरीका नहीं बदलता | वह सीखता है की उसे किस तरह अपनी मेहनत से उन सपनों को पूरा करना है जिनके लिए वह अपना भरा पूरा परिवार, बचपन के यार और खुबसूरत यादों को छोड़ कर आ गया है |

Photo:  Googleसुशांत किसी के आदर्श हों न हों लेकिन उनके सपने देश का प्रत्येक युवा अपने तरीके से देखता है | कौन युवा सफल नहीं होना चाहता ? कौन युवा अपना और अपने परिवार का नाम ऊँचा नहीं उठाना चाहता? कौन युवा अपने सपनों के लिए जीना नहीं चाहता ? सबके दिल दिमाग में सफल होना और आगे बढ़ना ही होता है | सब लोग खुश रहना चाहते है, अपनी जरूरतों को पूरा करना चाहते है, अपने सपनों को जीना चाहते है |

अब करोड़ों युवाओं में कुछ लोग अपने सपनों को पूरा कर पाते है तो अधिकांश लोग नहीं कर पाते है लेकिन खुद को उस व्यक्ति से रिलेट कर लेते हैं जैसे लोग फिल्म देखते देखते अपनी खुद की कहानी जोड़ लेते हैं |

सुशांत का इस तरह से जाना भला कोई भी कैसे पचा सकता है जब वह कहानी हर युवा की हो ? कोई कैसे किसी भी स्टोरी पर भरोसा कर ले ? दिल नहीं मान सकता और दिमाग तर्क करना नहीं छोड़ सकता ...

वह जहाँ भी रहें खुश रहें लेकिन उनका जाने का वक़्त नहीं था | वह अभी आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणा बनते, वह अपने संघर्ष की कहानियों से प्रेरित कर न जाने कितने युवाओं को सपने बुनने और जीने की कला सिखाते , न जाने कितने युवाओं को उस असफलता के अंधकार से निकालते जिनके सपने पुरे नहीं हो पाते |

Photo:Google

मुझे उम्मीद है उन्हें न्याय मिलेगा | पर अब  उनको क्या फर्क पड़ेगा न्याय या अन्याय से .... हाँ ! उस पिता को उस न्याय से एक संबल जरुर मिलेगा, क्योंकि उनके पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा है | कितने लाड-प्यार से अपने बेटे को बड़ा होते हुए देखे होंगें | उनकी कितने जिज्ञासाओं को शांत किये होंगे | उनके सपनों को समझे होंगे | उनके दिल की आवाज़ को सुने होंगे ...... वह जहाँ भी होंगें देख रहे होंगे कि उनकों चाहने वाले कितने लोग हैं | वह अपना सोशल मीडिया अकाउंट देखकर अपने चाहने वालों का अनुमान लगाते रहे होंगे लेकिन सच आज के युवाओं के आक्रोश और आंशुओं में देखा जा सकता है |


सोमवार, 2 अप्रैल 2018

अपने पड़ोसियों को नज़रंदाज करता भारत



Image Source: Google


चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, भूटान, नेपाल देश भारत के पड़ोसी देश हैं और बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे हैं की पड़ोसियों से रिश्ते मधुर रखना चाहिए, क्योंकि दूर के रिश्तेदार बाद में आते हैं लेकिन पड़ोसी तुरंत मौके पर उपस्थित रहते हैं |
पर शायद अब भारत यह भूल गया है और उसे पड़ोसियों की कोई फ़िक्र नहीं | बस, अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भर रहा है जो खतरे की घंटी है | भारत भले ही चीन के साथ अपने संबंधों को सहज देख रहा हो , पर चीन इसे अलग नजरिये से देखता है इसे आप सीमा पर हुए गतिरोध से समझ सकते हैं | चीन हमेशा से प्रसारवादी नीति का समर्थक रहा है , यहाँ तक की भारत के साथ अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर क्षेत्र के हिस्सों को लेकर अपना दावा करता रहा है और वह इसके प्रति सतर्क भी है | हाल के दो वर्षों की घटनाओं से आप यह समझ सकते हैं | हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी मुसीबत में पड़ने के बाद ही आया जो इतने सालों बाद भी बस एक जुमला बन के रह गया है |

भारत के यह पड़ोसी अब पराये बन रहे हैं , ताज़ा मामला मालदीव का ही देखें तो, दो टूक समान अधिकार शब्दों के माध्यम से चीन ने भारत को इस मामले से दूर ही कर दिया जबकि भारत ने मालदीव के तख्तापलट के संकट में भरपूर साथ दिया था | अब वहाँ के विपक्ष में भारत के प्रति नकारात्मकता पनपने लगी है | बगल में श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लगभग चीन को ही सौंप चुका है और भारी निवेश भी कर रहा है | वहीं चीन ने म्यांमार के साथ 24 अरब डॉलर का वित्तीय समझौता किया है तथा वहां एक बंदरगाह का निर्माण भी कर रहा है | नेपाल की मार्क्सवादी ओली सरकार का झुकाव चीन की तरफ है और चीन भारी मात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है , सिर्फ यही नहीं चीन से नेपाल के लिए ट्रेन की लाइन बिछाने पर भी काम चल रहा है इस तरह चीन की पहुँच नेपाल के रास्ते भारत के सीमा तक होगी | भूटान, एक ऐसा देश है जो भारत का साथ दे रहा है लेकिन चीन के लगातार दबाव को वह सहन करता है और वह दिन दूर नहीं जब भूटान भारत के पाले से निकल कर चीन की ओर खड़ा होगा | बांग्लादेश में अभी सबसे बड़ा निवेशक चीन ही है , भले इस देश की सीमायें भारत से जुड़ी हैं लेकिन वहां का राजनीतिक समीकरण भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है | रही बात पाकिस्तान की तो अब यह बात धीरे-धीरे पूरा विश्व समुदाय जानने लगा है की पाकिस्तान अब पूरी तरह चीन के साथ है जहाँ चीन यहाँ अनेक स्तर पर निवेश कर रहा है वहीँ ग्वादर बंदरगाह को बनाकर हिन्द महासागर तक अपनी पहुँच बनाते हुए स्पेशल आर्थिक जोन बनाते हुए पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते सुगम यातायात व्यवस्था के लिए सड़क निर्माण भी कर रहा है | भारत ने इसपर अपनी आपत्ति भी जताई है लेकिन यह बहुत कारगर नहीं रही है |

पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादियों के पनाह के देश के रूप में घोषित कराने में भारत को भले सफलता मिली हो लेकिन चीन उसके विकास में भरपूर सहयोग दे रहा है | यदि पाकिस्तान के साथ भारत का किसी भी तरह का युद्ध होता है तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना होगा | चीन अपने बड़े रणनीति के अनुसार भारत के सीमा पर अतिक्रमण कर उकसा रहा है और इधर पाकिस्तान घुसपैठ करा कर भारत के नाक में दम कर रखा है | भारत अपने विदेश नीति में पिछड़ता जा रहा है और चीन को एक तरह से वाक ओवर देता जा रहा है | चीन विश्व मंच पर भी भारत की खिलाफत करता रहा है चाहे वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देश की सदस्यता हासिल करना हो |


साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में ज्यादा से ज्यादा निवेश करके भारत को चारो ओर से घेरता जा रहा है और भारत अपने गुमान में आगे बढ़ने का दंभ भरता जा रहा है | चीन खुद को एशिया के एकमात्र  महाशक्ति के रूप में देखता है और उसी अनुरूप आचरण भी कर रहा है , वह कभी नहीं चाहेगा की भारत उसके समकक्ष खड़ा हो सके | उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को समर्थन देकर वह अमेरिका जैसे देश को आँख दिखाकर यह बताना चाहता है की वह उसके बराबर है | भारत का पड़ोसियों को अनदेखी करना अमेरिकी दोस्ती पर भारी पड़ेगी | भारत को अब भी सचेत होने की जरुरत है , अपने पड़ोसियों को समझने की जरुरत है अन्यथा चीन, भारत को एक ड्रैगन की तरह निगल जायेगा |  

(यह हमारे निजी विचार हैं , विदेश नीति एक बहुत बड़ा कांसेप्ट है और मैं उसके आस-पास भी नहीं फटकता , लेकिन विभिन्न समाचारों एवं लेखों इत्यादि के माध्यम से इस विषय में लिखने का विचार आया तो लिख दिया | यदि आप किसी बात से असहमत हो तो आप कमेंट में जरुर लिखें , यह जरुरी नहीं की मैं इस मुद्दे पर ज्यादा जनता हूँ आप कुछ भी अच्छा लिखेंगे तो यह मेरे लिखने में और सुधार ही करेगा |)


गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

सिंगुर का किसान ‘न घर का रहा न घाट का’



       फोटो : गूगल

सिंगुर , शायद आपने नाम सुना हो !
एक समय ऐसा था जब सभी समाचार पत्र , न्यूज़ चैनेल इस नाम से अपनी टीआरपी बढ़ाने में लगे हुए थे | लेकिन आज कोई सिंगुर की हालत पर बात नहीं करता | पश्चिम बंगाल का यह जगह कभी टाटा नैनो की लखटकिया परियोजना के लिए पुरे देश में चर्चा का विषय रहा | साथ ही यह किसानों की जमीन से जुड़ा मुद्दा भी रहा , कुछ किसानों ने खुद अपनी जमीन इस परियोजना के लिए दे दी, तो कुछ सरकार ने जबरदस्ती ले लिया | आन्दोलन हुए, राजनीति हुयी और फिर वाम सरकार को कई दशकों का शासन छोड़ना पड़ा | ममता बनर्जी , इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयीं, सुप्रीमकोर्ट तक लड़ाई लड़ी गयी और फिर किसानों के पक्ष में आदेश भी आया ,तत्पश्चात  नैनों प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा जो गुजरात चला गया | जमीन वापस किसानों को दी जाने लगी और साथ ही प्रभावित किसानों को प्रति महीने कुछ रूपये और सस्ते अनाज भी | ..... जिस जमीन पर यह परियोजना बन रही थी उसके बहुत सारे हिस्से पर कार्य चल रहा था जो लगभग आधा के करीब पहुँच गया था, जिस जमीन पर लहलहाती खेती हुआ करती थी वहां बस कंक्रीट के ढांचे और खम्भे खड़े दिखाई देने लगे | सड़कें पक्की बन गयी और ड्रेनेज सिस्टम भी बन गया .... मतलब पूरा आधार तैयार हो गया | फिर ........

किसानों को जमीन वापस दे दी गयी , अब किसान ‘न घर का रहा न घाट का’ | उस मजबूत बने कंक्रीट के आधार पर वह दुबारा खेती नहीं कर सकता और उसे हटाने में मानव श्रम काफी नहीं हैं तथा सरकार उसे हटाने के लिए कोई प्रयास भी नहीं कर रही है यदि मनरेगा के तहत उसे हटाने की कवायद चल भी रही है तो वह कितने वर्षों में हटेगा यह आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं | क्या होगा सिंगुर के किसानों की हालत ? आप सोच के ही दुखी हो जायेंगे , वह तो भुक्तभोगी हैं | जिन किसानों की आजीविका खेती से चलती थी वह आज मजदुर बन गए , कुछ ने उम्मीद लगायी होगी की फैक्ट्री चलेगी तो रोजगार के कुछ न कुछ साधन बन ही जायेंगे , बन ही जाते | लेकिन वह भी नहीं हुआ ... अब उस क्षेत्र की जनता को वहीँ के नेताओं ने उस हालत में ला दिया जिसे वह कभी सपने में भी नहीं सोचे होंगें | ऐसे अदूरदर्शी फैसले से लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे न तो सरकार जानना चाहती है और न ही अधिकारी | देश बोलने से नहीं करने से बदलेगा .... पर किसी को क्या फर्क पड़ता है जब सिंगुर के किसान का लड़का अपनी पढ़ाई छोड़ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में मजदूरी करे, रिक्शा चलाये , पकौड़े बेचे , और एक ऐसी जिंदगी जिए जिसे वह कभी जीना नहीं चाहता रहा हो | एक ऐसे परेशानी से गुजरे जिसे स्थानीय राजनेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए खड़ी किये हों | भारत की अधिकांश जनता अभी भी कृषि पर जीवनयापन कर रही है लेकिन आप उसे वहां भी जीने नहीं देना चाहते | एक किसान होना उस भगवान होने जैसा है जो हमें अन्न देता है लेकिन आप उसके ही खेत को छीन कर उसे ही भूमिहीन बना दिए , मजदुर बना मज़बूरी की जिंदगी जीने के लिए बेबस कर दिए | यदि इस तरह किसी के जीवन को बर्बाद कर विकास करना चाहते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब पुरे देश में असंतोष होगा और लोग जीने के लिए एक दुसरे को मारते फिरेंगे | किसी विशेष क्षेत्र में अपराध बढ़ने का यह भी एक कारण होता है | हम किसी फैक्ट्री या परियोजना का विरोध नहीं करते , हाँ ! बस वह वहां की जनता के हित के लिए होना चाहिए ..... भविष्य में कोई सिंगुर न बने इस उम्मीद के साथ , जय हिन्द ! 
Reference : www.thewirehindi.com

शुक्रवार, 5 मई 2017

बर्बरता के लिए कोई माफ़ी नहीं - सुप्रीमकोर्ट

आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने यह साबित कर दिया की देश के न्यायतंत्र में देर भले ही है पर अंधेर नहीं है |
निर्भया केस में कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को जस का तस रख कर , दोषियों के मौत की सजा को बरकरार रखा है |
यह निर्णय एक नज़ीर है और आने वाले समय में कोई भी ऐसी गन्दी और क्रूर हरकत करने के पहले १००० बार सोचेगा |
जिस तरह कोर्ट ने इसे बर्बर कृत्य बताते हुए इसे क्रूरता की सुनामी के रूप में परिभाषित किया उससे इस केस की गंभीरता प्रदर्शित होती है |
निर्भया के माँ पिता के संग भारत के प्रत्येक संवेदनशील लोंगों को यह फैसला बहुत ही राहत देने वाला है |
निर्भया के पिता ने कहा भी – “ हम सुप्रीमकोर्ट के निर्णय से बहुत खुश है , देर सही पर मुकम्मल निर्णय है |”

निःसंदेह यह निर्णय न्यायतंत्र में एक विश्वास जगाता है और इस बात पर विराम लगाता है की न्याय व्यवस्था बहुत ही लचर हो चुकी है |

बुधवार, 3 मई 2017

नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों का भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए

सुप्रीमकोर्ट द्वारा सराहनीय पहल ! शिक्षामित्रों को किया जा सकता है बर्खास्त | अखिलेश सरकार ने वोट की राजनीति में नौनिहालों के जीवन से जो खिलवाड़ शुरू किया था , अब वक़्त आ गया है की यह सब बंद हो | पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षकों की जगह शिक्षामित्रों को रखकर पुरे बेसिक शिक्षा के साथ मजाक किये अखिलेश सरकार | अब यूपीटेट २०११ के सभी उत्तीर्ण लोंगों को पूर्ण समायोजन किया जाना चाहिए | शिक्षामित्रों से कोई विरोध नहीं है लेकिन जो गलत है वह गलत है उनकी नियुक्ति ही अवैध और असंवैधानिक तरीके से हुयी |

साथ ही प्राईमरी स्कूल के बच्चों के ड्रेस के बारे में भी बात करना चाहता हूँ | आप देखते होंगे की छोटे प्यारे बच्चे स्कूल ड्रेस में खाकी रंग का पेंट और शर्ट दोनों ही पहने हुए होते हैं ऐसे लगता है की सब मजदूर बनने या पुलिस बनना चाहते है | आखिर अखिलेश सरकार ऐसा ड्रेस कोड बना के क्या सन्देश देना चाहती थी ??? की सब बच्चे नॉन स्किल लेबर और पुलिस होमगार्ड बनने से ज्यादा ना सोच पाएं ??? उनके सोच को बस वहीँ तक समेट दें की वह आगे की सोचे ही ना और हम उत्तर प्रदेश में राज करते रहें | जरा सोचिये इन सब चीजों का एक बच्चे के ऊपर क्या असर पड़ता है तब समझेंगे ... इस तरह का ड्रेस बदलना चहिये | उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को सुधार कर ही प्रदेश को उदीयमान बनाया जा सकता है , तभी असली विकास होगा | नौकरी और वोट के चक्कर में नौनिहालों की जिंदगी और भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए |

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

जन्नत यहीं है धरती पर

स्रोत :गूगल 

खुदा ने इंसान को इस धरती पर धर्म का ढ़िँढोरा पीटने के लिये नहीं भेजा है । इंसानियत के वजूद को बनाये रखने के लिये भेजा है । धर्म इंसान के बाद आता है क्योंकि यह जितने भी धर्म है किसी खुदा ने नहीं इंसानों ने बनाया और तथाकथित धर्मगुरुओं ने उसे अपने अनुसार परिभाषित किया है । किसी भी धर्म में महिलाओं को दासी बनाकर रखने की इजाजत नहीं है और ना ही उनके अधिकार छीनने की बात है , धर्म शब्द की गलत व्याख्या कर के इंसानियत को खत्म कर रहे हैं धर्मान्ध लोग । जन्नत यहीं है धरती पर , और उसकी खुबसूरती महिलाओं से है । वही निर्माण करती है । सिर्फ भभकती बातें और गंदी गाली और अधुरे ज्ञान से विक्षिप्त मानसिकता की प्यास बुझ सकती है लेकिन सच यही है की पुरुष हो या महिला सबको जीने का बराबर अधिकार है । महिलाओं का यह अधिकार है की उनको क्या पहनना है क्या करना है इसमें धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ... इंसान है तभी धर्म है नहीं तो धर्म का कोई वजूद नहीं |

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

बदलाव के नायक

बदलाव के नायक

राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है ‘बदलाव’ | राजनीति में जाति विशेष की बहुलता के साथ ही समय समय पर नायक भी बदले जाते हैं | भारत की वर्तमान राजनीति में दलित वर्ग को सभी पार्टियाँ बहुत ही प्यार भरी नज़र से देख रहीं हैं और अपने अपने तरीके से डॉ भीमराव आंबेडकर को अपना नायक बताने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं | आज अम्बेडकर सभी राजनितिक दलों की जरुरत बन गए हैं | ऐसा लगता है की सत्ता की चाबी हैं, अम्बेडकर | खैर , उच्च वर्ग से धीरे धीरे निम्न वर्ग की तरफ झुकती हुई पार्टियाँ यह एहसास तो दिला रही है की दलित मजबूत हुआ है और हो रहा है तथा यह इस बात का द्योतक है की समाज अपने बेहतर अवस्था में आने के लिए अंगड़ाई ले रहा है |
पर एक प्रश्न हमेशा ज़ेहन में रहता है की क्या यह राजनितिक पार्टियाँ बस चुनावी लाभ के लिए ही दलित प्रेम दिखाती है या वास्तव में इनके दिल में वह प्यार है ?
हालाँकि सीधा सीधा तो बस यही लगता है की यह बस एक दिखावा ही है | वोट मिल जाये और फिर काम निकल जाये | पार्टियों का मुख्य उद्देश्य तो यही रहता है की दलित वर्ग या पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को पार्टी में लायें और उस समाज का वोट उस आधार पर पाएं | क्योंकी यह जो समाज के आधुनिक उद्धारक हैं वह सिर्फ अपना फायदा देखते हैं इनको खुद के ही समाज से ज्यादा सारोकार नहीं होता है | ऐसा उदाहरण आप यूपी, बिहार के राजनीति में आसानी से देख सकते हैं | अभी यूपी में चुनाव आने वाला है और राजनितिक पार्टियाँ अपना रंग बदलने लगी हैं , इसलिए दलितों के बहुत सारे नायक दिखेंगे जो माइक पर चिल्ला चिल्ला कर यह बताएँगे की वही उनके नायक हैं और वही समाज में बदलाव लायेंगे | जो पिछले हजारों वर्षों से चल रहा है ........


गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव

उत्तर प्रदेश : बहुमत का झुकाव


यूपी विधानसभा का चुनाव अगले साल फ़रवरी-मार्च तक होने की संभावना है | बोर्ड की परीक्षा को देखते हुए ,पहले या बाद में चुनाव हो सकते हैं | चूँकि चुनाव है और सभी पार्टियाँ अपने अभियान को धार देने में जी-जान से जुटी हुई हैं और साथ ही मौजूदा सरकार अपने पांच वर्ष के कार्य को प्रचारित –प्रसारित भी कर रही है | भाजपा मोदी के सहारे , सपा अपने किये गए कार्य के सहारे, बसपा विरोध के सहारे,तो कांग्रेस खाट पंचायत के सहारे और अन्य पार्टियाँ अपने अपने गोलबंदी के सहारे , तरह तरह के अभियान चला रखीं हैं | सभी अभियान का लक्ष्य यूपी में बहुमत पाना और सरकार बनाना है | इन सबके बाद बात आती है जनता की, आखिर जनता क्या चाहती है | चूँकि संविधान में जनता जनार्दन को यह सोचने का अधिकार तो दिया ही गया है की वह किसको अपना सरकार और भाग्य विधाता चुनेगी | (अपने अनुभव द्वारा, उत्तर प्रदेश के लोंगों से मिलने और गाँव गाँव घुमने के बाद) जहाँ तक लोंगों की बात करें तो लोग मौजूदा सरकार के कार्य से तो थोड़ा बहुत खुश हैं, ख़ासकर युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से | लेकिन लोग दुबारा सत्ता नहीं सौपना चाहते ( इसके बहुत से वजह हैं , जिन पर यहाँ चर्चा करना ठीक नहीं) | दूसरी तरफ विपक्ष और विरोधी पार्टी बसपा, जिनके शासन-प्रशासन और पारदर्शिता को अब लोग दुबारा याद करने लगे है ( भ्रष्टाचार को छोड़ के) और साथ ही दलित वर्ग का समर्थन भी है | इनकी बातें ज्यादा हो रहीं है और सरकार बनाने के दौड़ में फ़िलहाल आगे हैं | भाजपा का कोई चुनावी चेहरा नहीं है और बिहार के बाद एक बार फिर पूरा दारोमदार मोदी जी पर है , साथ ही पार्टी में टिकट को लेकर अंदरूनी कलह की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता | अपने-अपने क्षेत्र के महारथी टिकट बंटवारे को लेकर कलह कर सकते है साथ ही मुख्यमंत्री कौन होगा यह भी तय नहीं है | जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर समाज को साधने की कोशिश तो हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर हिंदुत्व कार्ड को छोड़कर बाकि ऐसा कुछ नहीं है जिससे जनता का रुझान भाजपा की तरफ हो | फिर भी पाकिस्तान के विरोध और सर्जिकल स्ट्राइक के पापुलरिटी इनको फायदा पहुंचाएगी और सरकार बनाने की दौड़ में यह भी सबसे आगे हैं | कांग्रेस के राहुल गाँधी खाट पंचायत कर कर के कार्यकर्ताओं में कुछ जान तो फूंके है लेकिन यह संजीवनी प्रदेश में सीट दिला पायेगी इसका भरोसा नहीं है | एक बात हो सकता है की अगर कुछ सीटें इनको मिली तो यह किंगमेकर की अवस्था में आ सकती है | यह पार्टी सपा या बसपा किसी से मिलकर भाजपा को रोकने की कोशिश भरपूर करेगी |
जनता अब बहुत समझदार हो गयी है तथा देश और प्रदेश के चुनाव के महत्व को जानती है | बिहार चुनाव इसका उदहारण है लेकिन साथ ही साथ असम का चुनाव भी बिता है तो सटीक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता | जनता की बातों और रुझान से बसपा अभी आगे है परन्तु भाजपा भी अपने संगठन, प्रचार और मोदी के कार्य के साथ विकास को मुख्य मुद्दा बनाते हुए , मैदान में ललकार रही है | इन बातों के बाद एक लाइन याद आ गया –
“उम्मीदों का प्रदेश, उत्तर प्रदेश”


शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

राहुल गाँधी की बस यात्रा, बस ! यात्रा ..

राहुल गाँधी की बस यात्रा, बस ! यात्रा ..

source :Google 
पिछले कई दिनों से राहुल गाँधी, उत्तर प्रदेश की यात्रा पर रहे | देवरिया से दिल्ली तक | अब वह दिल्ली अपने दरबे में आ गए हैं , बहुत सुकून मिला होगा उन्हें, किसी तरह यात्रा पूरा तो हो गया | प्रशांत भूषण (रणनीतिकार,पेशेवर) क्या-क्या करवायेंगे, शायद यही सोच के राहुल जी थक जाते होंगे |  
बेसक राहुल गाँधी ने इतनी लम्बी यात्रा की लेकिन क्या वह उत्तर प्रदेश में धरातल से भी नीचे जा चुकी कांग्रेस पार्टी में जान फूंक पाए ?? क्या किसानों, युवाओं, बेरोजगारों और यूपी की जनता का दिल जीत पाए ? क्या उनसे जुड़ पाए ?
अगर बात करें की पार्टी में जान फूंक पाए तो यह कहा जा सकता है की कुछ तो प्रभाव पड़ा ही हैं आम कार्यकर्ताओं में , लेकिन वह कितने देर रहेगा यह सोचने की बात है | रही बात दिल जीतने और लोंगों से जुड़ने की तो वह न के बराबर ही रही | दरअसल राहुल गाँधी, परिस्थिति और लोंगों के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाते और ना ही खुद से कुछ बोल पाते हैं | और यह उनके नेतृत्व की क्षमता पर सवालिया निशान भी लगाता है | रटी- रटायें बातें एक बार अच्छी लग सकती हैं, हर बार एक ही बात बोलने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता | यही दोहराव हर बार राहुल जी के भाषण में देखने के लिए मिला | मोदी का विरोध और कुछ मांग जैसे – किसानों का कर्जा माफ़, बिजली बिल हाफ़, और क्षेत्र के हिसाब से कुछ जोड़ लिया – पूर्वांचल में बेरोजगारी, बुंदेलखंड में सुखा तो पश्चिमी यूपी में चीनी मीलों की बात |
क्या राहुल गाँधी को यह लगता है की जनता कुछ नहीं जानती या फिर इन्हीं को कुछ नहीं मालूम ? आज भी इनके पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में वही पुराने कांग्रेसी लोग आते हैं जो राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के ज़माने से जुड़े हुए है | नए लोग कम ही आते हैं अगर आते भी है तो बस पार्टी में कोई पदाधिकारी बनने या फिर किसी पदाधिकारी के साथ भीड़ बनकर |
यूपी की जमीन पर राजनीति, दिल्ली से कभी नहीं हो सकती | वहां का राजनीतिक समीकरण और जनता का रुझान मीडिया के दलीलों से नहीं समझा जा सकता | उत्तर प्रदेश जीतने के लिए पहले वहां के लोंगों का दिल जीतना पड़ेगा | दिल्ली के युवा की तरह सिर्फ फ्री वाई-फाई के लिए सरकार नहीं बनाते यूपी के युवा , वहां के लोग एक उम्मीदों के लिए सरकार बनाते हैं की उनकी परेशानी दूर हो सके | बिजली मिले, किसानों को खाद- बीज और सस्ते क़र्ज़ मिले , चीनी मिल चालू हो , फसलों का समर्थन मूल्य मिले , युवा बेरोजगारों को रोजगार मिले, महिलाओं को चिकित्सीय सुविधा के साथ सम्मान मिले , बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले | लेकिन इतने वर्षों के आज़ादी के बाद यूपी में, बस कुछ-कुछ बदला है ,और वह भी समय की देन है | सरकार तो कितनी बनी लेकिन समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी रहीं | स्वघोषित राजनेताओं ने राजनीती को विकास के चकरघिन्नी से निकाल कर जातिवाद की तरफ मोड़ ले गए | जातिगत समूहों को लगा की अब तो कुछ विकास होगा पर वहां भी छलावा ही रहा | कभी मंदिर तो कभी मस्जिद ... सब हो गया पर कोई ऐसा नहीं मिला जो उत्तर प्रदेश को उसकी हालत और हालात से बहार निकाल कर लोंगों के उम्मीदों को पंख दे सकें | हर बार नई उम्मीदों के साथ लोग सरकार चुनते है और बस ठगे जाते हैं |

राहुल गाँधी के नेतृत्व और बात में, यह कहीं नहीं झलकता की वहां की जनता उनसे कोई उम्मीद कर सकती है | बहुत सफ़र तय करना होगा राहुल जी को .... एक तरफ अखिलेश यादव एक युवा सीएम और अपने काम को लेकर जाने जाते है तो दूसरी तरफ मायावती भी अपने शासन से प्रभावित की हैं | बीजेपी की बैतरनी मोदी जी के सहारे है पर बिहार चुनाव को देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता | राहुल गाँधी के पास खुद को स्थापित और साबित करने का एक बेहतरीन मौका है लेकिन वह अपने पहले ही प्रयास में कुछ ख़ास नहीं कर पाए जबकि देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा भी पूरी हो गयी |  

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

चीन की चाल और भारत की नज़र

चीन की चाल और भारत की नज़र
source:Google
जब आप स्कूल में पढ़ते रहे होंगे तो आपके साथ कुछ ऐसे साथी भी पढ़ते रहे होंगे जो आपसे भी मीठा मीठा बात करते होंगे और आप जिनसे बात नहीं करना चाहते हैं उनसे भी वैसे ही बात करते रहे होंगे | दरअसल उनका मकसद यही होता है की दोनों को साधे रखें |
बिल्कुल उपरोक्त कथन की तरह चीन भी , भारत और पाकिस्तान के साथ वही कर रहा | इधर उसको बड़ा बाज़ार चाहिए उधर उसको भारत पर अपनी पकड़ बनाने के लिए पाकिस्तान का साथ चाहिए क्योंकी भारत का मुख्य सहयोगी अमेरिका बना हुआ है | चीन को अमेरिका से परेशानी है इसलिए सब कुछ बहुत ही व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जा रहा चीन द्वारा | अभी हाल में जब भारत ने पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल ऑपरेशन किया तो पाकिस्तान भाग कर चीन के पास गया और चीन ने ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोक दिया | यह सारा वाकया इसलिए हुआ क्योंकी कुछ दिन पहले भारत ने पाकिस्तान से जुड़े सिन्धु जल समझौते की समीक्षा करने की बात कही थी |
आज भारत के अन्य पड़ोसी देश नेपाल, बांग्ला देश आदि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के सुर में बात कर रहे जो सकारात्मक रुख है | इधर भारत भी विश्वसमुदाय को अपने पाले में करने के लिए और पाकिस्तान को सभी विश्व संगठन से अलग थलग करने की मुहीम चला रखी है | यह जरुरी भी है क्योंकी धीरे धीरे सभी देशों को यह पता चल ही गया है की पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है | आतंकवादी देश घोषित करने के लिए नैतिक दबाव बनाना जरुरी है |
भारत  की संप्रभुता और अखंडता से कोई भी देश, व्यक्ति या संस्था खिलवाड़ नहीं कर सकती | आज भारत के पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जिसकी इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है और वह देश को एक नई दिशा देने में लगे हुए हैं | बहुत कम समय में ही भारत की पहचान पुरे विश्व में एक शक्ति के रूप में हो रही है , अमेरिका भी इस बात को समझ रहा है इसलिए दोस्ती के सम्बन्ध को दोनों देश के राजनयिक मजबूत करने में लगे हैं | भारत किसी भी देश का अहित नहीं चाहता और सभी देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है और भूख, गरीबी , पर्यावरण जैसी गंभीर समस्याओं से लड़ना चाहता है | भारत सत्य, अहिंसा का देश है , यहाँ विभिन्न संस्कृति और विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं और भारत को एक लोकतान्त्रिक देश के रूप में सुसज्जित करते हैं |

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

भारत के विकास में रोड़ा अटकाने की कोशिश

भारत के विकास में रोड़ा अटकाने की कोशिश
Source:Google 

भारत और पाकिस्तान के बढ़ते गतिरोध ने अंततः भारत को सर्जिकल हमले के लिए मजबूर कर दिया | अभी एक दिन पहले भारत द्वारा सार्क सम्मलेन में भाग ना लेने की घोषणा को पाकिस्तान को विश्व समुदाय से अलग-थलग करने के नज़र से देखा जा रहा है |
नियंत्रण रेखा के पार जाकर भारतीय सैनिकों ने आतंकी शिविरों पर कार्यवाही की | पिछले कई दिनों से बहुत तनाव की स्थिति बनी थी | पाकिस्तान के आतंकवादियों द्वारा भारतीय सेना के 18 लोंगों को सोते वक्त मार दिया गया, आखिर कोई भी संप्रभु राष्ट्र इसे कब तक सहेगा ??
भारत जहाँ अपने विकास की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ रहा है , देश को विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा करने के लिए मेनहत कर रहा वहीं पाकिस्तान आतंकियों को संरक्षण देकर और भारत पर हमला करवाकर, कश्मीर की अवाम को गुमराह करके एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है | आज विश्व समुदाय इस बात को समझ रहा है की पाकिस्तान जैसा राष्ट्र अपने विकास पर ध्यान न देकर सिर्फ आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है | वर्तमान समय में चीन , पाकिस्तान का प्रमुख शुभचिंतक बना हुआ है वह भी सिर्फ इसलिए की शक्ति संतुलन कर सके ( भारत और अमेरिका सम्बन्ध को देखते हुए ) और अपनी व्यापारिक लाभ प्राप्त कर सके |
भारत हमेशा से शांति और दोस्ती को आगे बढ़ाने की बात करता आया है लेकिन सीमा पार से सिर्फ आतंकियों को भेजा जाता रहा है | खुद पाकिस्तान इस मसले को नहीं सुलझाना चाहता है | कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है यह जानते हुए भी उसकी कल्पना करना गुनाह है, यह बात पाकिस्तान को समझना चाहिए | पाक अधिकृत कश्मीर और बलोस्चिस्तान में पाक के मानवाधिकार हनन की बातें जिस तरह बाहर आ रही है ,इस तरह तो पाकिस्तान को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए |

मेरा व्यक्तिगत विचार है की पाकिस्तान , भारत के विकास को देखते हुए जलन महसूस कर रहा है और इसीलिए वह उसके रास्ते में रुकावट पैदा करने के लिए तरह तरह के युद्ध उन्मादी कार्य कर रहा है | इतिहास गवाह रहा है की युद्ध कुछ भी नहीं देता शिवाय नुकसान के और पाकिस्तान भारत के लिए यही चाहता है की जब भारत उसके स्तर तक गिर जायेगा तो वह इसी गतिविधि में उलझा रहेगा | लेकिन उसे यह समझना चाहिए की भारत उससे बहुत आगे निकल चुका है और यहाँ के बुद्धिजीवी और नेतृत्व चाहे वह जिस पार्टी से हों आगे ही ले जायेंगे | भारत की सोच, दृष्टि और उद्देश्य स्पष्ट है |

बुधवार, 28 सितंबर 2016

राहुल गाँधी और उनकी वर्तमान राजनीतिक यात्रा


राहुल गाँधी और उनकी वर्तमान राजनीतिक यात्रा

source: Google 

राहुल गाँधी, एक ऐसे युवा नेता हैं जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है | उन्हें पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत संघर्ष नहीं करना पड़ा है परन्तु आज भारतीय राजनीति में उनकी सहभागिता लोंगों को समझ नहीं आती | एक युवा होने के नाते जितना आक्रामक उन्हें होना चाहिए वो नहीं हैं | जहाँ भारत का संविधान विपक्ष की राजनीति को भी सम्मान देता है वहां विपक्ष इतना कमजोर है की किसी भी मुद्दे पर बहस करने की बजाय सदन से बाहर भागने की जल्दी होती है |
आज-कल राहुल गाँधी, उत्तर प्रदेश में खाट यात्रा कर रहें हैं | आम आदमी, किसान ,जवान  सबसे मिलने निकले हैं | जब खुद को ख़ास समझ लेंगे तो फिर आम आदमी से कैसे मिलेंगे ???? फोटो देखकर यही सोच रहा था |
सत्ता से बाहर हैं तो सबकी कितनी चिंता है इनको | चुनावी रैली छोड़कर राहुल गाँधी कितनी बार देवरिया गए हैं ? कितनी बार लखीमपुर गए या फिर कितनी बार देश के उन पिछड़े इलाकों में गए जहाँ लोग जीवन के मुलभूत चीजों के लिए परेशान हैं ??
जब चुनाव आता हैं तो गरीबों और किसानों का दर्द महसूस होने लगता हैं | सत्ता में बैठ कर कुछ नहीं दिखाई देता | जिस देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है वहां का कृषक जीवन जीने के लिए संघर्ष करता हैं बाकि सुविधाएं तो सिर्फ सपना है |
आज राहुल जी यात्रा कर रहे हैं , उनका कोई स्पष्ट नीति नहीं है की वह लोंगों को बता सकें शिवाय इसके की मोदी सरकार गरीबों और किसानों के लिए क्या कर रही है, जान ले रही है , मार रही है, वो तो पूरा विश्व भ्रमण कर रहें है फला फला फला .... | कांग्रेस ने 50 साल से ज्यादा शासन किये सत्ता की चासनी में डूब डूब के नहाये फिर भी गरीबी भुखमरी दूर नहीं कर पाए और आज आप , आपकी पार्टी सवाल कर रहे हैं | जिस दिन आप जैसे राजनीतिक परिवार के बच्चे जमीन से जुड़ कर आम लोंगों के साथ संघर्ष कर पार्टी लाइन में आगे आयेंगे तब आम लोंगों का दर्द महसूस होगा |

होता है राहुल जी , जब अपने मुहं में निवाला जाता रहता है और किसी चीज की कमी नहीं होती तो ऐसा लगता है की सब लोग तो खुश ही है , सबका पेट भरा ही है |

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

गाँव की पगडंडी: क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?

गाँव की पगडंडी: क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?

क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?

क्या युद्ध ही अंतिम समाधान है ?



युद्ध का नाम आते ही उसकी भयावहता आँखों के सामने तैरने लगती है | फिर भी युद्ध का उन्माद बना हुआ है , कहीं वाजिब कारण है तो कहीं बिना किसी कारण के | आज युद्ध का उद्देश्य बदल गया है | राजाओं और मुग़ल शासकों ने अपने राज्य, सिंहासन और राज्य विस्तार के लिए युद्ध लड़ा और आज धर्म के विस्तार के लिए युद्ध हो रहें हैं | जहाँ तक सभी धर्म के मूल की बात करें तो किसी धर्म ने बिना वज़ह युद्ध की इज़ाज़त नहीं दिया लेकिन कुछ विकृत मानसिकता के धर्मगुरु ( किसी भी धर्म के ) लोंगों को बरगला कर धर्मयुद्ध में ढकेल रहे हैं |
शांति और मानवता के पुजारी बस इतिहास के पन्नों और अपने जन्मतिथियों तक सिमट गए हैं | सत्य और अहिंसा बस कोरी बातें साबित हो रही हैं | कोई जबरदस्ती युद्ध थोप रहा है तो कोई अपने बचाव में युद्ध कर रहा है | सभी वैश्विक शक्तियां अपने अपने फायदे और बाजारीकरण के फ़िराक में बस मूक दर्शक बनी देख रहीं हैं |
भारत देश , एक संप्रभु और गणतंत्र राष्ट्र के रूप में जाना जाता है लेकिन पड़ोसी मुल्क अपनी हरकतों से बार बार युद्ध के लिए उकसा रहा है | आखिर एक कश्मीर की वजह से कितनी जानें जाएँगी और कितनी राजनीति होगी ???
कश्मीर भारत का अंग है यह जानते हुए भी पड़ोसी मुल्क लगातार घुसपैठ करके निर्दोष सैनिकों और नागरिकों को मार रहा है | और सम्पूर्ण विश्व के सामने अपने कुरूप चेहरे को अपने बातों से ढकने का प्रयास कर रहा है |
एक कहावत है – “ सौ सुनार की और एक लोहार की | जो वर्तमान स्थिति में पड़ोसी मुल्क पर सटीक बैठता है | लेकिन भारत देश शांति का देश है | यह ऐसा देश है जहाँ युद्ध नहीं प्यार की बात पर जोर दिया जाता है | क्योंकी शक्तिशाली व्यक्ति बहुत उदार होता है तब तक जब तक अंतिम स्थिति में मामला न पहुँच जाये |
पड़ोसी मुल्क को यह समझना चाहिए जो वह कभी समझना नहीं चाहेगा कि शांति और अमन से नागरिकों का ख्याल करके गरीबी और अशिक्षा को दूर कर राष्ट्र के विकास में ध्यान लगाना चाहिए | 70 साल गुजरने के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया | भारत जैसा देश खुद को संभालते हुए प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ओर कदम बढ़ा रहा वहीँ पड़ोसी मुल्क उसके विकास में बाधक बनने पर तुला हुआ है | युद्ध के लिए उकसाना क्या सही है ?? युद्ध क्या देता है ??? क्या युद्ध ही किसी बात का समाधान है ??? सबको सोचना चाहिए खासकर पड़ोसी मुल्क के लोंगों को |


सोमवार, 26 सितंबर 2016

आधुनिक समय में संवेदना


आधुनिक समय में संवेदना

वो पेपर का टुकड़ा जो मेरे हाथ लगा ....



गाँव शहर , भीड़ , नौकरी, पैसा, जरुरत और भी न जाने क्या क्या .... इंसान भाग रहा है , कहाँ उसको भी नहीं पता | शायद उसकी अपनी जरूरतें या फिर इच्छायें | कभी कभी अकेले बैठ के सोचता और देखता हूँ तो ऐसा लगता है सारी दुनिया एक दौड़ में हैं समय नहीं किसी के पास दूसरों को देखने का , शायद अपनों को भी |
अचानक एक पेपर का टुकड़ा हाथ लगा , और सोच के आश्चर्य हुआ की क्या मानव संवेदना अभी बची है ????
उस पेपर के एक न्यूज को पढ़कर तो कुछ ऐसा ही लगा जैसे समुन्द्र के बीच कोई लकड़ी का टुकड़ा मिला हो और एक उम्मीद बनी हो |
उरी आतंकी हमले में 18 जवान शहीद हुए | भारत के लोंगों की भावनाएं और दुआएं वातावरण में फ़ैल गयी | सोशल मीडिया में श्रधांजली तो चौक चौराहों पर मोमबतियां लिए नागरिक दुःख व्यक्त कर रहे थे | उसी सामाचार को कहीं बैठ के देख रहे थे सर्वेश तिवारी जिसमें गया, बिहार के शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की बेटियां यह जानते हुए की उनके पिता शहीद हो गए और उनका शव घर आ रहा है बावजूद उसके वह लड़कियां अपने स्कूल का पेपर देने गयी | एक रिपोर्टर ने जब पुछा की आप पेपर देने जा रहीं हैं तो बेटियों ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया – मेरे पापा हमें पढ़ाना चाहते थे और हम पेपर नहीं देंगें तो वो नाराज़ हो जायेंगे |
सर्वेश तिवारी यह बात सुन के और उन बेटियों को टीवी पर देखकर रो दिए और सोच लिए की उनको क्या करना है | गया के जिलाधिकारी से संपर्क कर 22 सितम्बर  को  शहीद के घर जाकर उनके परिवार और पत्नी बच्चों से मिले और 20 लाख रूपये का चेक दिया और तीनों बेटियों और एक बेटे के शिक्षा की जिम्मेवारी ली | एक ऐसी संवेदना का परिचय दिया की वह पेपर का टुकड़ा मैं अपने कमरे के दीवार पर लगा दिया | शायद इसलिए की खुद को ये बता सकूँ की मानवता , संवेदना अब भी जिन्दा हैं | भले कुछ ही लोंगों में पर उसी से समाज अपने रास्ते पर चल रहा है | और यह देश इतनी विविधताओं के बाद भी एकता की सूत्र में बंधा हुआ है | यहाँ कितने वाद और पंथ हैं , जातियां और धर्म हैं , भाषा और बोली है फिर भी संवेदना एक है | भारत एक है यहाँ के लोग एक है | भारतीय सेना सीमाओं की सुरक्षा करती है और समाज के ऐसे प्रहरी जो मानवता की सेवा करते हैं | ऐसे देशभक्तों को सलाम करने का दिल चाहता है , गुणगान करने का दिल चाहता है |

ऐ इंसानों सुन लो ,
जब तक संवेदना है ,तुम जिन्दा हो |
मशीन महसूस नहीं कर सकते
जब तक भावनाएं हैं , तुम जिन्दा हो ||


-         विन्ध्या सिंह  

आधुनिक समय में संवेदना


आधुनिक समय में संवेदना

वो पेपर का टुकड़ा जो मेरे हाथ लगा ....



गाँव शहर , भीड़ , नौकरी, पैसा, जरुरत और भी न जाने क्या क्या .... इंसान भाग रहा है , कहाँ उसको भी नहीं पता | शायद उसकी अपनी जरूरतें या फिर इच्छायें | कभी कभी अकेले बैठ के सोचता और देखता हूँ तो ऐसा लगता है सारी दुनिया एक दौड़ में हैं समय नहीं किसी के पास दूसरों को देखने का , शायद अपनों को भी |
अचानक एक पेपर का टुकड़ा हाथ लगा , और सोच के आश्चर्य हुआ की क्या मानव संवेदना अभी बची है ????
उस पेपर के एक न्यूज को पढ़कर तो कुछ ऐसा ही लगा जैसे समुन्द्र के बीच कोई लकड़ी का टुकड़ा मिला हो और एक उम्मीद बनी हो |
उरी आतंकी हमले में 18 जवान शहीद हुए | भारत के लोंगों की भावनाएं और दुआएं वातावरण में फ़ैल गयी | सोशल मीडिया में श्रधांजली तो चौक चौराहों पर मोमबतियां लिए नागरिक दुःख व्यक्त कर रहे थे | उसी सामाचार को कहीं बैठ के देख रहे थे सर्वेश तिवारी जिसमें गया, बिहार के शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की बेटियां यह जानते हुए की उनके पिता शहीद हो गए और उनका शव घर आ रहा है बावजूद उसके वह लड़कियां अपने स्कूल का पेपर देने गयी | एक रिपोर्टर ने जब पुछा की आप पेपर देने जा रहीं हैं तो बेटियों ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया – मेरे पापा हमें पढ़ाना चाहते थे और हम पेपर नहीं देंगें तो वो नाराज़ हो जायेंगे |
सर्वेश तिवारी यह बात सुन के और उन बेटियों को टीवी पर देखकर रो दिए और सोच लिए की उनको क्या करना है | गया के जिलाधिकारी से संपर्क कर 22 सितम्बर  को  शहीद के घर जाकर उनके परिवार और पत्नी बच्चों से मिले और 20 लाख रूपये का चेक दिया और तीनों बेटियों और एक बेटे के शिक्षा की जिम्मेवारी ली | एक ऐसी संवेदना का परिचय दिया की वह पेपर का टुकड़ा मैं अपने कमरे के दीवार पर लगा दिया | शायद इसलिए की खुद को ये बता सकूँ की मानवता , संवेदना अब भी जिन्दा हैं | भले कुछ ही लोंगों में पर उसी से समाज अपने रास्ते पर चल रहा है | और यह देश इतनी विविधताओं के बाद भी एकता की सूत्र में बंधा हुआ है | यहाँ कितने वाद और पंथ हैं , जातियां और धर्म हैं , भाषा और बोली है फिर भी संवेदना एक है | भारत एक है यहाँ के लोग एक है | भारतीय सेना सीमाओं की सुरक्षा करती है और समाज के ऐसे प्रहरी जो मानवता की सेवा करते हैं | ऐसे देशभक्तों को सलाम करने का दिल चाहता है , गुणगान करने का दिल चाहता है |

ऐ इंसानों सुन लो ,
जब तक संवेदना है ,तुम जिन्दा हो |
मशीन महसूस नहीं कर सकते
जब तक भावनाएं हैं , तुम जिन्दा हो ||


-         विन्ध्या सिंह  

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

खाट का मजाक और देहात

खाट का मजाक और देहात

अभी कुछ दिन पहले राहुल गाँधी जी ने देवरिया , उत्तर प्रदेश से दिल्ली तक यात्रा शुरू की और साथ ही खाट सभा का आयोजन कर रहे है जो लगातार चल रहा है | पहली खाट सभा का आयोजन देवरियां में ही हुआ , जहाँ हजारों की संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे और खाट सभा में भाग लिए | नेता जी के जाने के बाद लोंगों ने वहाँ पड़ी हुई खाट अपने अपने घर उठा के ले जाने लगे | जिसको सभी टीवी चैनलों और मिडिया के अन्य माध्यमों ने बहुत ज्यादा कवरेज दिया , शायद उतना राहुल गाँधी के भाषण को न मिला हो |
पुरे दिन ट्वीटर ट्रेंड रहा #खाटसभा #खाट इत्यादि | फेसबुक पर तरह तरह के भद्दे मजाक भी बने | पर शायद खुद को पढ़ा लिखा और तकनिकी ज्ञानी मानकर लोग यह भूल गए की एक आम ग्रामीण इंसान के लिए खाट की क्या इज्जत है और उसके जीवन में कितना महत्व है |
एक शहरी इंसान जिसके पास सारी सुख सुविधाएं है वह घर बैठे ऐसे ही मजाक बना सकता है क्योंकी उसको पता ही नहीं की उसके  जीवन स्तर से निम्न जीवन स्तर जी रहे उन ग्रामीणों के लिए वह एक खाट उनके आराम से सोने के लिए एक आधार है तो एक मरीज़ को ले जाने के लिए एम्बुलेंस | आज भी जा कर देखिये दूर दराज के गाँवों को जहाँ ढंग की सड़के तक नहीं , बस गाड़ी की तो बात ही बहुत दूर की है | ढंग के स्कूल नहीं अगर हैं भी तो 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं , जहाँ लोग अपने बच्चों को प्राइमरी के बाद की शिक्षा के लिए भेजते हैं | शहर जाने के लिए 2-2 पैसे जोड़ने पड़ते हैं |
पर हम लोग तो मजाक ही उड़ायेंगे क्योंकी हमारी शहरी मानसिकता के अनुसार सभी ग्रामीण तो पिछड़े हैं | खाट तक नहीं छोड़ते , ले के भाग जाते हैं .... अब आप ही बताइए की जब सभा ख़त्म हो गयी और उस खाट का कोई उपयोग नहीं है तो लोग क्या करें ????
एक खाट उनके लिए , उस शहरी बेड से कहीं ज्यादा है तो फिर क्यों न ले जायें ???
हर बात पर मजाक आसानी से किया जा सकता है लेकिन सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं हो सकती |

दूसरों पर हँसना ज्यादा आसान होता है .....

पक्ष और विपक्ष की राजनीति में भूल गए आम जनता का दर्द

  आजकल राजनीतिक माहौल से आप सभी परिचित होंगे। संसदीय सत्र की कार्यवाही और बहस देख लें तो आपको हंसी भी आएगी और खींझ भी होगा कि हमने इस लोकतन्...